होलाष्टक : अशुभ काल या आध्यात्मिक साधना का अवसर

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Published By Anjali Singh
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होली का त्योहार हिंदू धर्म में न केवल रंगों के उल्लास, बल्कि गहरी आध्यात्मिक मान्यताओं का भी प्रतीक है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है। पूर्णिमा से आठ दिन पूर्व यानी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक होलाष्टक कहलाती है।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान ग्रहों का नकारात्मक प्रभाव बढ़ जाता है और वातावरण में उग्रता रहती है, जिसके कारण समस्त मांगलिक व शुभ कार्यों पर पूर्णतः विराम लग जाता है। होलाष्टक की यह अवधि हमें संयम और भक्ति का संदेश देती है, जो अंततः होलिका दहन की अग्नि के साथ समाप्त होती है।-डॉ. विपिन शर्मा, ज्योतिषाचार्य 

वर्जित कार्य

    किसी भी उद्देश्य के लिए भवन का निर्माण करना
    गृह प्रवेश करना 
    सगाई अथवा विवाह करना 
    वाहन क्रय करना
    कुआं, जलाशय आदि खुदवाना 
    मुंडन संस्कार करना
    किसी भी व्रत का आरंभ और उद्यापन करना 
    नवविवाहिता वधु का प्रवेश 
    देव प्रतिमा की स्थापना करना 
    यज्ञोपवीत संस्कार 
    मंत्र दीक्षा लेना 
    कर्ण वेध

नैमित्तिक कर्म

जो कार्य पहले शुरू किए जा चुके हैं। उन कार्यों को जारी रखा जा सकता है। नित्य एवं नैमित्तिक कर्म किए जा सकते हैं। इनके अतिरिक्त सूतिका स्नान आदि कार्य जिनकी अवधि निश्चित होती है, वे कार्य किए जा सकते हैं। इसके साथ ही नित्य की पूजा-पाठ किए जा सकते हैं।

होलाष्टक और ग्रहों का संबंध

होलाष्टक के आठ दिनों में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु का प्रभाव विशेष रूप से तीव्र होता है। यह समय अधिकतर शुभ कार्यों के लिए निषेध माना गया है, लेकिन ग्रह शांति और आत्मिक उन्नति के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है।

होली से पहले किए जाने वाले उपाय

    हनुमान जी की विशेष पूजा करें। मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी को चमेली के तेल का दीपक जलाएं और ‘ॐ हनुमते नमः’ का 108 बार जाप करें। इससे मंगल और शनि के अशुभ प्रभाव कम होंगे।

     आर्थिक तंगी से छुटकारा पाने के लिए पीपल के वृक्ष पर आठ दिन तक जल चढ़ाएं और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें। घर के मुख्य द्वार पर गंगाजल और गौमूत्र का छिड़काव करें, इससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहेंगी और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा।

      शत्रु बाधा और बुरी नजर से बचने के लिए
 
होलिका दहन से पहले 7 लाल मिर्च और 7 लौंग  अपने ऊपर से उताराकर के जलती हुई होलिका में डालें। अपने घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का 
दीपक जलाएं और ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ मंत्र का 21 बार जाप करें।

     ग्रह कलेश और कुंडली दोष निवारण के लिए

होलाष्टक में प्रतिदिन सूर्य को जल अर्पित करें और ‘ॐ सूर्याय नमः’ का 11 बार जाप करें।
कुंडली में राहु-शनि की दशा हो, तो शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध और काले तिल अर्पित करें।

    परिवार में सुख-शांति के लिए घर में सात्विक भोजन बनाएं और ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं। ‘ॐ नमः शिवाय’ का 108 बार जाप करें, जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होगी। घर में समृद्धि के साथ सात्विक वातावरण बनेगा।

क्यों माना जाता है अशुभ

होलिका दहन से पहले प्रहलाद पर अनेक अत्याचार किए गए थे, जिनकी पीड़ा के कारण इन आठ दिनों को नकारात्मक ऊर्जा से भरा माना जाता है। इस दौरान किए गए अशुभ कार्यों का प्रभाव लंबे समय तक रहता है।
कुंडली उदाहरण: यदि किसी जातक की कुंडली में शनि नीच का हो और राहु लग्न में हो, तो होलाष्टक के दौरान शनि, राहु और केतु से संबंधित उपाय करने चाहिए, जैसे- सरसों के तेल का दीपक जलाना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना।

सिर्फ अशुभ न मानें

सामान्यतः इस अवधि को अशुभ मानकर मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित रखा जाता है, परंतु इसे केवल 'अशुभ' कहना उचित नहीं होगा। वास्तव में, होलाष्टक आध्यात्मिक उन्नति और आत्मशुद्धि का एक विशिष्ट अवसर है। पौराणिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस समय ग्रहों का स्वभाव उग्र होता है, जिससे बचने के लिए भौतिक कार्यों को रोककर ध्यान, मंत्र जाप और तप पर बल दिया जाता है। यह समय ध्यान, मंत्र जाप और ग्रहों की शांति के लिए उत्तम है। जो भी इन उपायों को करेगा, उसके जीवन में सुख-समृद्धि का वास होगा और नकारात्मक ग्रह दोष समाप्त होंगे।

 

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