विदेशी विश्वविद्यालय: शिक्षा का वैश्वीकरण या नई असमानता की शुरुआत

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Published By Anjali Singh
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हाल ही में खबर आई थी कि नौ ब्रिटिश विश्वविद्यालय भारत में अपने कैंपस स्थापित करने की तैयारी कर रहे हैं। भारत के उच्च शिक्षा परिदृश्य में यह टर्निंग पॉइंट 2023-24 से आया था। तभी से दुनिया के नामी विश्वविद्यालयों ने हमारे देश की जमीन पर अपने स्वतंत्र कैंपस खोलना शुरू किया। यह बदलाव यूं ही नहीं आया। इसके पीछे है यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के फॉरेन हायर एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस रेगुलेशंस- 2023 और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी- 2020 की वह सोच, जिसमें भारत को “वैश्विक शिक्षा केंद्र” बनाने का सपना देखा गया है।

आज यह सपना धीरे-धीरे हकीकत में बदल रहा है। ऑस्ट्रेलिया की डीकिन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ वोलोंगोंग ने गुजरात में पढ़ाई शुरू करवा दी है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथैम्प्टन, गुरुग्राम में अपना कैंपस खोल चुकी है। हैंइलिनॉय इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी,यूनिवर्सिटी ऑफ़ लिवरपूल, यूनिवर्सिटी ऑफ़ यॉर्क, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल, वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी, कोवेंट्री यूनिवर्सिटी और क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट को भारत में कैंपस खोलने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट मिल चुका है। सवाल यह नहीं है कि विदेशी विश्वविद्यालय आ रहे हैं। असली सवाल है-इससे भारत को क्या मिलेगा, क्या खो सकता है और इसे कैसे संतुलित किया जाए?--राजेश जैन

भारत इसलिए बना विदेशी विश्वविद्यालयों का नया ठिकाना

भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा युवा बाजार है। 30 वर्ष से कम उम्र की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है, लेकिन उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात अभी भी लगभग 30 प्रतिशत के आसपास है। यानी करोड़ों युवा ऐसे हैं, जो बेहतर शिक्षा के मौके तलाश रहे हैं। दूसरी ओर, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों के विश्वविद्यालय घरेलू नामांकन में ठहराव और सरकारी फंडिंग में कटौती झेल रहे हैं। हालिया वीजा सख्ती ने अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की संख्या भी प्रभावित की है। ऐसे में भारत उनके लिए हाई-पोटेंशियल मार्केट बनकर उभरा है। यहां अंग्रेजी बोलने वाले छात्र हैं, उभरता मध्यम वर्ग है और अंतर्राष्ट्रीय डिग्री की मजबूत मांग है। आसान शब्दों में कहें, तो यह विन-विन मॉडल है-विदेशी संस्थानों को नया बाजार, भारत को ग्लोबल एजुकेशन का एक्सेस।

घर बैठे मिलेगी विदेशी डिग्री

सबसे बड़ा फायदा है-घर बैठे विदेशी डिग्री। अब भारतीय छात्रों को मास्टर्स या स्पेशलाइज्ड कोर्स के लिए विदेश जाने, लाखों की फीस, वीजा तनाव और महंगे जीवनयापन का सामना नहीं करना पड़ेगा। अनुमान है कि भारत में वही डिग्री 25-30 प्रतिशत कम लागत में मिल सकेगी। इसके साथ उनको अंतर्राष्ट्रीय पाठ्यक्रम, इंडस्ट्री-फोकस्ड ट्रेनिंग, ग्लोबल फैकल्टी एक्सपोजर, बेहतर रिसर्च कल्चर भी मिलेंगे। बिजनेस एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, फिनटेक, कंप्यूटिंग जैसे कोर्स सीधे भविष्य की नौकरियों से जुड़े हैं। इससे स्किल गैप कम हो सकता है और भारतीय ग्रेजुएट्स की ग्लोबल एम्प्लॉयबिलिटी बढ़ सकती है।

प्रतिभा पलायन पर लगेगी रोक  

2019 में करीब 5.8 लाख भारतीय छात्र विदेश गए थे। 2023 में यह संख्या 9 लाख तक पहुंच गई। इनमें से 75 प्रतिशत से ज्यादा वहीं बसने की इच्छा रखते हैं। इसका मतलब-देश से प्रतिभा भी जा रही है और अरबों डॉलर विदेशी मुद्रा भी। अगर यही गुणवत्ता भारत में उपलब्ध हो जाए, तो “ब्रेन ड्रेन” की जगह “ब्रेन रिटेंशन” संभव है। विदेशी कैंपस देश के भीतर ही अंतर्राष्ट्रीय माहौल तैयार कर सकते हैं।

रिसर्च और अकादमिक सुधार का मौका

विदेशी विश्वविद्यालय सिर्फ क्लासरूम नहीं लाते-वे साथ लाते हैं रिसर्च कल्चर, गवर्नेंस मॉडल और अकादमिक डिसिप्लिन। संयुक्त रिसर्च सेंटर, फैकल्टी एक्सचेंज और साझा प्रोजेक्ट्स के जरिए भारतीय संस्थानों की क्षमता बढ़ सकती है। पहले से ही भारत के पास मजबूत आधार है-जैसे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बॉम्बे, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरु और यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली जैसे संस्थान। सही सहयोग हुआ, तो भारत सिर्फ स्टूडेंट-सोर्स देश नहीं रहेगा, बल्कि नॉलेज-प्रोड्यूसर बनेगा।

कुछ चिताएं भी हैं

सबसे बड़ी चिंता है-वहनीयता। विदेशी कैंपस की फीस भले विदेश से कम हो, लेकिन भारतीय औसत आय के हिसाब से यह अभी भी बहुत ज्यादा है। खतरा यह है कि ये संस्थान सिर्फ अमीर वर्ग तक सीमित रह जाएं। इससे शिक्षा में सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है-जो नई शिक्षा नीति- 2020 के समावेशी शिक्षा के  लक्ष्य के खिलाफ है।

दूसरी चुनौती है-व्यावसायीकरण। अगर रेगुलेशन कमजोर रहा, तो कुछ विदेशी संस्थान शिक्षा को प्रोडक्ट की तरह बेच सकते हैं। चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के उदाहरण बताते हैं कि कम नामांकन और ऊंची लागत के कारण कई विदेशी कैंपस कुछ साल में बंद भी हो गए।

तीसरा मुद्दा है-स्थानीय प्रासंगिकता। अगर पाठ्यक्रम भारतीय सामाजिक-आर्थिक जरूरतों से कटे रहे, स्थानीय फैकल्टी शामिल न हो और इंडियन कॉन्टेक्स्ट गायब हो तो ये कैंपस “एलिट आइलैंड” बनकर रह जाएंगे।

लचीलापन और जवाबदेही दोनों जरूरी

यूजीसी ने विदेशी विश्वविद्यालयों को पाठ्यक्रम, फीस और प्रवेश में काफी स्वायत्तता दी है ताकि वे तेजी से काम शुरू कर सकें, लेकिन अब जरूरत है स्मार्ट रेगुलेशन की। हमें ऐसा मॉडल चाहिए, जिसमें टॉप-रैंक संस्थानों को ऑपरेशनल फ्रीडम मिले, फीस स्ट्रक्चर पारदर्शी हो, छात्र अधिकार सुरक्षित रहें, न्यूनतम छात्रवृत्ति को अनिवार्य किया जाए और अकादमिक गुणवत्ता की नियमित ऑडिट हो।

देश को इस रणनीति की दरकार  

हर विदेशी कैंपस में इडब्यूएस और वंचित वर्ग के लिए स्कॉलरशिप अनिवार्य की जाए, अकेले कैंपस नहीं-भारतीय संस्थानों के साथ साझा मॉडल को बढ़ावा दिया जाए, रिसर्च और फैकल्टी डेवलपमेंट को प्राथमिकता मिले, सिर्फ टीचिंग तक सीमित न रहा जाए, पाठ्यक्रमों का भारतीयकरण हो ताकि वे यहां की अर्थव्यवस्था, समाज और उद्योग से जुड़े रहें और दीर्घकाल में भारत को अपनी “आईवी लीग” तैयार करनी होगी, जहां आईआईटी , आईआईएम और एम्स जैसे संस्थान वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष पर हों।

विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत आना सिर्फ शिक्षा सुधार नहीं-यह कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सॉफ्ट पावर से भी जुड़ा है। सही नीति के साथ यह पहल भारत को एशिया का एजुकेशन हब बना सकती है, लेकिन अगर इसे केवल बाजार के हवाले छोड़ दिया गया, तो यह अमीरों की शिक्षा बनकर रह जाएगी। आज भारत एक दोराहे पर खड़ा है-एक रास्ता वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की ओर जाता है, दूसरा नई शैक्षिक असमानता की तरफ। फैसला हमें करना है।

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