संस्मरण: कर्म की प्रतिध्वनि
उस रोज इज्जतनगर स्टेशन पर टिकेट बुक कराने गया तो उम्मीद से ज्यादा भीड़ थी। टिकट विंडो से बाहर तक लंबी लाइन। शायद त्योहार नजदीक होना इसकी वजह रहा हो। लाइन में लगे लोग इंतजार के फासले को अपने-अपने हिसाब से तय कर रहे थे। टिकट विंडो में हाथ डाला ही था कि एक सज्जन जो कि लाइन में ठीक मुझसे पहले थे और लगभग आधा घंटे किसी से फोन पर क्वेरीज कर-कर के अपने दर्जन भर टिकट ( कुछ कैंसिल कुछ बनवाकर) अभी-अभी निकले ही थे, दौड़ते हुए आए और मेरे हाथ की परवाह किए बिना विंडो में हाथ घुसाते हुए गुस्से की मुद्रा में टिकट कर्ता से बोले- “मैडम आपने हमारा टिकट गलत तारीख का दे दिया।” “नहीं, ऐसा तो नहीं है, टिकेट दिखाइए”- टिकेट बनाती लड़की बोली।
“ऐसा कैसे नहीं है ये देखिए! हमें जाना 20 को है और आपने टिकट 21 का बना दिया”- टिकट देते हुए उन सज्जन ने खौरियाते हुए कहा। लड़की ने टिकट देखा और उस व्यक्ति द्वारा भरे गए फॉर्म से मिलाया। पूरी तरह आश्वस्त होकर बोली -“यह देखिए सर! आपने फॉर्म में जो डिटेल दी है, वही टिकट में है।” व्यक्ति ने तेजी से फॉर्म और टिकेट का मिलान किया। खोजने पर भी उस लड़की की नहीं, बल्कि अपनी ही कमी पाकर तुरत गिरगिटिया रूप धर क्रोध को याचना में बदलते हुए बोला- “सॉरी मैडम! ग़लती हो गई। ऐसा कीजिए, इस टिकट की डेट बदल दीजिए।” “ऐसे डेट नहीं बदली जाती। अब यह टिकट कैंसिल करके दूसरा बनवाना पड़ेगा आपको” - लड़की ने कहा। “देख लीजिए कुछ हो सके तो, वरना ऐसा ही ...” वह व्यक्ति बोला।
इतनी देर में लाइन में लगे लोगों का सब्र जवाब दे चुका था। वे अपने-अपने भाषाई संस्कारों से उस व्यक्ति को नवाजने लगे। लड़की ने इस घमासान के बीच कुछ फॉर्म उस व्यक्ति को दिए और ध्यान पूर्वक भरकर लाइन में लगने को कहकर मेरा टिकट बनाने लगी। मैंने टिकट और बकाया पैसे जैसे-तैसे विंडो से मुट्ठी बांधकर बाहर निकाले और स्टेशन के बाहर आ गया। बाहर आकर टिकेट की डेट और अन्य डिटेल चैक की। किराये की राशि देखी। हाथ में आए पैसे भी चैक किए। मिलान किया तो पाया कि मुझ पर चार सौ रुपए ज्यादा आ गए हैं।
वापस दो सौ रुपया होने थे। सौ-सौ के चक्कर मे एक सौ के नोट के साथ एक पांच सौ का आ गया था। मैंने फिर से एक बार टिकट और पैसों का मिलान किया और इसे तत्कालीन माहौल में लड़की की मानवीय त्रुटि मानते हुए पैसा वापस करने विंडो पर आ गया। “क्यों, आपकी भी डेट बदल गयी है क्या?” लाइन में लगा एक व्यक्ति बोला। “नहीं भाई”- मैंने जवाब दिया। “तो क्या कोई इन्क्वायरी करनी है, वो विंडो उधर है”- एक और व्यक्ति बोला। “इसीलिए महिला को विंडो पर नहीं बैठाना चाहिए, लोग बार-बार दर्शन करने ...” एक और व्यक्ति ने दांत चियारे।
“मैडम मुझ पर चार सौ रुपया ज्यादा आ गए हैं।” - इस चुहल चर्चा के बीच मैं विंडो की ओर मुंह करके जोर से बोला। लड़की टिकट बनाते से सहसा रुकी। मुझे देखा। मैंने मुट्ठी बांधकर टिकट और धनराशि उसे बढ़ा दी। लड़की ने कम्प्यूटर में कैलकुलेट किया और बोली - “थैंक्स अ लॉट सर!” उसकी आंखों में कृतज्ञता की नमी थी, जिसे साफ-साफ देखा और अनुभव किया जा सकता था।
अगला हफ्ता बनारस में रहा। वापसी में श्रमजीवी एक्सप्रेस से बरेली लौट रहा था। रात में लगभग दो बजे ट्रेन से उतरा। बाहर आकर रिजर्व ऑटो लिया और घर के गेट पर पहुंच गया। ऑटो वाले को पैसे देने के लिए जैसे ही जेब में हाथ डाला तो सन्न रह गया। जेब से पर्स नदारद था। पर्स में पैसों के अलावा अन्य जरूरी कागजात भी थे। तुरंत ऑटो को बैक किया, लेकिन तब तक ट्रेन जा चुकी थी। उसी ऑटो से वापस आया। पत्नी से पैसे लेकर पेमेंट किया और पर्स में गुम हुई चीजों के बारे में क्या करना है यही सोचते विचारते सो गया।
सुबह ऑफिस पहुंचा और अपने कामों में रम गया। दोपहर में लंच के लिए घर जाने को निकल ही रहा था कि एक अनजान नंबर से फोन आया। “आप कौन बोल रहे हैं जी?”- उधर से आवाज थी। “आपने किसको लगाया है जी?” “जी मैं अवनीश हूं श्रीमान!” मैंने कहा। “कहां से जी?” “बरेली से जी!” “आप अभी बनारस गए थे क्या?” “जी हां, लेकिन आप कौन हैं और यह सब क्यों पूछ रहे हैं?” मैं बोला। “बताऊंगा जी, पहले ये बताओ आपके आई कार्ड पर, जो फोटो लगा है, उसमें आपने किस रंग की शर्ट पहनी है?” वार्तालाप यहां तक आते आते मेरे अंदर पॉजिटिव वाइब्स बहने लगी थीं।
“व्हाइट और पिंक चैक!” मैं चहककर बोला और कार्ड पर अंकित पूरी डिटेल भी बता दी। “बहुत बढ़िया यादव जी। मैं राम कीरत सिंह बोल रहा हूं गजरौला से। मेरे पास आपका पर्स है, जिसमे पैंतालीस सौ बासठ रुपए और अन्य कागजात सुरक्षित हैं। रात को बरेली से ट्रेन में बैठा था। सुबह उतरते वक्त सीट के नीचे से अटैची खींची तो यह पर्स मिला। परिचय पत्र में दिए नंबर को मिलाकर ही आप से बात कर रहा हूं। बताइए आपकी अमानत कहां और कैसे पहुंचवा दूं? वैसे कल तक मैं मुरादाबाद में हूं अपने बेटे के पास।” “मैं कल खुद आऊंगा आपके दर्शन करने भाईसाब, मुरादाबाद मेरा गृह जनपद है”, मैं भाव विभोर होकर बोला। “अरे वाह! यह तो बहुत बढ़िया। मैं इंतजार करूंगा। पहुंचने को हों तब दस मिनट पहले फ़ोन कीजियेगा, मैं लेने आ जाऊंगा”- उधर से आवाज थी।
अगली सुबह बस से मुरादाबाद उतरा। सामने एक सामान्य कद काठी, लेकिन मुस्कराते और जिंदगी की चमक से भरपूर चेहरे को देखते ही मैं पहचान गया कि यही हैं रामकीरत जो वाकई राम जी की कृति भी है और कीर्ति भी। रामकीरत जी के साथ पूरा दिन मुहब्बत और इंसानी जज्बात से लबरेज रहा। लौटते वक्त तक अपरिचय एक खूबसूरत रिश्ते में तब्दील हो चुका था। पुनः यह विश्वास और पुख्ता हुआ कि दुनिया हमारे कार्य व विचारों की प्रतिध्वनि ही है। यह वही लौटाती है, जो हम इसे सौंपते हैं।- डॉ. अवनीश यादव
