यौन हिंसा पीड़ितों के मामलों में नए दिशा-निर्देश, गर्भसमापन, मेडिकल जांच व पीड़ित सहायता के लिए मानक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य
लखनऊ, अमृत विचार: यौन हिंसा और बलात्कार के मामलों में गर्भवती लड़कियों व महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने और मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए प्रदेश सरकार ने सोमवार को सभी चिकित्सा संस्थानों व प्रशासनिक अधिकारियों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब गर्भसमापन, मेडिकल जांच और पीड़ित सहायता के लिए मानक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा।
यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका संख्या-2751/2025 में 6 फरवरी 2026 को पारित आदेश के अनुपालन में जारी किया गया है। अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष की ओर से जारी शासनादेश में कहा गया है कि यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं और लड़कियों के मामलों में गर्भसमापन, चिकित्सा सहायता, जांच और परामर्श से संबंधित सभी प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इसके लिए पहले से जारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) और नए दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने को कहा गया है। शासनादेश सभी चिकित्सा अधीक्षकों, मुख्य चिकित्सा अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को भेजा गया है। साथ ही पुलिस महानिदेशक, मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने स्तर से इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराएं।
24 सप्ताह तक गर्भसमापन की व्यवस्था
दिशा-निर्देशों के अनुसार यौन हिंसा से गर्भवती हुई महिला या लड़की का गर्भसमापन मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत 24 सप्ताह तक कराया जा सकता है। 20 सप्ताह तक के मामलों में जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विशेषज्ञ की निगरानी में प्रक्रिया पूरी की जाएगी और एफआईआर या पुलिस रिपोर्ट का इंतजार किए बिना उपचार में देरी नहीं की जाएगी।
मेडिकल जांच और साक्ष्य संग्रह के स्पष्ट प्रावधान
प्रोटोकॉल में यह भी कहा गया है कि पीड़िता की मेडिकल जांच महिला मेडिकल अधिकारी द्वारा की जाएगी और जांच से पहले लिखित सहमति अनिवार्य होगी। नाबालिग या मानसिक रूप से अक्षम पीड़िता के मामलों में अभिभावक की सहमति ली जाएगी। जांच के दौरान डीएनए साक्ष्य, नमूने और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित तरीके से एकत्र कर 96 घंटे के भीतर जांच एजेंसी को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
काउंसलिंग और आर्थिक सहायता भी
सरकार ने निर्देश दिया है कि पीड़िताओं को चिकित्सा उपचार के साथ मनोवैज्ञानिक परामर्श भी दिया जाए और उन्हें उपलब्ध सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी जाए। इसमें उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष और उत्तर प्रदेश पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।
पहचान गोपनीय रखने के निर्देश
दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी और मीडिया या किसी अन्य माध्यम में उसका खुलासा नहीं किया जाएगा। उपचार, जांच और फॉलो-अप की पूरी प्रक्रिया में पीड़िता की गरिमा और गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
