लखनऊ : बसपा के कोर वोटरों में सेंध लगाने में क्या सफल हो पाएगी कांग्रेस
लखनऊ, अमृत विचार: कांग्रेस ने पहली बार बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को सामाजिक परिवर्तन दिवस के रूप में मनाया है तो इसके पीछे सियासी फायदे की गणित भी साफ दिखाई दे रहा है। अगले साल विधान सभा चुनाव हैं। बसपा का कोर वोटर समझे जाने वाले दलित वर्ग के वोटरों की संख्या यूपी में खासी प्रभावी है। करीब 100 विधान सभा सीटों पर दलित वर्ग के वोट खासे निर्णायक स्थिति में हैं, जिसमें 84 सीटें एससी के लिए रिजर्व हैं। इन पर कांग्रेस की सीधी नजर है। बड़ा सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस इस आयोजन के जरिए बसपा के कोर वोटरों में सेंध लगाने में कितनी सफल होगी।
बसपा संस्थापक कांशीराम और मायावती ने खासा संघर्ष कर दलित वर्ग को पार्टी से जोड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक प्रदेश में करीब 19 फीसदी वोट दलित वर्ग का है। जिसमें जाटव करीब 12 फीसदी और गैर जाटव सात फीसदी के करीब है। इन 19 फीसदी वोटरों के दम पर ही मायावती चार बार सूबे की मुख्यमंत्री रहीं। हालांकि इसमें सोशल इंजीनियरिंग का भी बड़ा हाथ रहा। लेकिन कोर वोटर साथ होने के कारण ही अन्य समाज के लोग बसपा के साथ आए। लेकिन वर्ष 2012 में बसपा के हाथ से सत्ता खिसकी तो अभी तक ग्राफ गिरता ही जा रहा है। हालत यह रहे कि वर्ष 2022 के चुनाव में बसपा के महज एक विधायक ही निर्वाचित हो पाए। बसपा की इस गिरावट का फायदा वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को कुछ हद तक मिला। तभी से कांग्रेस और सपा ने दलित वर्ग पर डोरे डालने शुरू कर दिए।
उधर एक बार फिर बसपा सुप्रीमो मायावती अपने पुराने फार्म में लौटने की कवायद में हैं। बीते नौ अक्टूबर-25 को संस्थापक कांशीराम की पुण्य तिथि पर लखनऊ में जिस तरह से लाखों लोगों की भीड़ जुटी, इससे संकेत हैं कि कोर वोटर एक बार फिर बसपा की तरफ लौट रहा है। साथ ही मायावती की भी सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। इसके चलते कांग्रेस दलित वोटरों का कितना हिस्सा अपने पाले में कर पाती है। यह भविष्य ही बताएगा।
