रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के साथ निर्यात में भी
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से देश के रक्षा उत्पादन में करिश्माई बढ़ोतरी हुई है, और आपूर्तिकर्ताओं की संख्या भी बड़ी है। देश के सभी 16 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (डीपीएसयू) सीमाओं की सुरक्षा में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में मजबूत स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का कुल रक्षा उत्पादन सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचकर 1.51 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया। इसमें डीपीएसयू और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी करीब 77% तक रही है।
आंकड़ों के अनुसार, केवल 16 डीपीएसयू ने मिलकर इस उत्पादन में 1.16 ट्रिलियन रुपये से अधिक का योगदान दिया है। इसके चलते डीपीएसयू के उत्पादन में भी 16% की वृद्धि सामने आयी है।
भारत के रक्षा उत्पादन में (डीपीएसयू) का योगदान काफी महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' जैसी पहल के माध्यम से देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भरता कम कर रहा है, और इस काम में डीपीएसयू आधार स्तंभ बनकर आगे बढ़ रहे है। यही नहीं, देश के बढ़ते रक्षा निर्यात में भी डीपीएसयू महत्वपूर्ण योगदान कर रहे है। वर्ष 2024-25 में कुल 23,622 करोड़ के रिकॉर्ड निर्यात में डीपीएसयू का हिस्सा 8,389 करोड़ रुपये रहा है। इस तरह डीपीएसयू के निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में 42.85% की वृद्धि दर्ज की गयी है। यह आंकड़ा भारतीय रक्षा उत्पादों की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
वर्तमान में डीपीएसयू न केवल लड़ाकू विमान (तेजस), मिसाइल (आकाश), और युद्धपोत जैसे जटिल प्लेटफार्मों का निर्माण कर रहे हैं, बल्कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र भी तैयार कर रहे हैं। सरकार 2029 तक कुल रक्षा उत्पादन को रुपये 3 लाख करोड़ तक ले जानी की दिशा में काम कर रही है, जिसमें डीपीएसयू की भूमिका को आधारशिला के रूप में देखा जा रहा है। यह उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत रक्षा क्षेत्र में तेजी से बढ़ती स्वदेशी क्षमता को दर्शाती है, जिसमें डीपीएसयू आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशीकरण और उत्पादन के मुख्य स्तंभ हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर में डीपीएसयू की उत्कृष्ट भूमिका को स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स की विश्वसनीयता और क्षमता का प्रमाण बताया था। मौजूद वैश्विक हालात जिसमें रूस-यूक्रेन युद्ध, मिडिल ईस्ट देशों में युद्ध और पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव तथा चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए देश की सामरिक जरूरतों को पूरा करने के साथ डीपीएसयू ने महत्वपूर्ण तकनीकों के तीव्र स्वदेशीकरण, समग्र आरएंडडी, उत्पाद गुणवत्ता सुधार, समयबद्ध डिलीवरी और निर्यात वृद्धि पर अपना फोकस बढ़ा दिया है। भारत सरकार भी इस बात पर जोर दे रही है कि डीपीएसयू स्पष्ट आरएंडडी और इंडिजेनाइजेशन रोडमैप तैयार करें।
भारत वर्तमान में अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया सहित 100 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है। बढ़ते निवेश, नीति सुधारों, और डीपीएसयू के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी ने निर्यात को गति प्रदान की है। देश में 16,000 से अधिक एमएसएमई इकाइयां रक्षा विनिर्माण में सक्रिय हैं, जो ड्रोन्स से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक कई महत्वपूर्ण तकनीकों का निर्माण कर रही हैं। इसके चलते रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़कर करीब 23% तक पहुंच गई है। इसे देखते हुए भारत सरकार ने अगले तीन वर्षों में 3 लाख करोड़ रुपये के उत्पादन के साथ 50,000 करोड़ रुपये के निर्यात का बड़ा लक्ष्य तय किया है। इसी के तहत साल 2025 को 'सुधारों का वर्ष' घोषित किया गया था।
सरकार का उद्देश्य देश के सशस्त्र बलों को तकनीकी रूप से उन्नत युद्ध के लिए तैयार अभेद्य सैन्य शक्ति में बदलना है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की तरफ मजबूती से बढ़ते कदमों को देखते हुए यह काम अब कठिन नहीं रह गया है। वर्तमान सरकार की सोच, दिशा और जन-जागरूकता ने इस उद्देश्य को नई उड़ान दी है। इसमें कोई शक नहीं कि डीपीएसयू और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग और मजबूत करके, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता देकर और रक्षा निर्यात को कूटनीति का प्रभावी साधन बनाकर, भारत एक बड़े हथियार आयातक देश से जल्दी ही एक विश्वसनीय वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र में रूपांतरित हो सकता है। इस प्रक्रिया में रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि औद्योगिक क्षेत्र के आधुनिकीकरण और सामरिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगा, जो देश की आर्थिक मजबूती का भी प्रमुख आधार बनेगा।
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- डॉ. विकास शुक्ला, कानपुर
