बरेली: कुपोषण से लड़ाई लड़ रही मकरंदपुर की राजकुमारी

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अमृत विचार, बरेली। पौष्टिक आहार जब तक स्वादिष्ट ने हो तब तक बच्चे उसे खाने को तैयार नहीं होते। ऐसे में मां-बाप कभी डांट-फटकार कर तो कभी जबरदस्ती बच्चों को पौष्टिक आहार खिलाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। कुछ मां-बाप थक-हार कर बच्चों को पौष्टिक आहार देते ही नहीं हैं। कुछ ऐसा ही हाल …

अमृत विचार, बरेली। पौष्टिक आहार जब तक स्वादिष्ट ने हो तब तक बच्चे उसे खाने को तैयार नहीं होते। ऐसे में मां-बाप कभी डांट-फटकार कर तो कभी जबरदस्ती बच्चों को पौष्टिक आहार खिलाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। कुछ मां-बाप थक-हार कर बच्चों को पौष्टिक आहार देते ही नहीं हैं। कुछ ऐसा ही हाल ब्लॉक आलमपुर जाफराबाद की बाल विकास परियोजना भमौरा के ग्राम मकरंदपुर धाराजीत के परिवारों का था।

यहां महिलाएं आंगनबाड़ी से पौष्टिक आहार ले तो जाती थीं लेकिन बच्चों को नहीं खिला पाती थीं। घर-घर भ्रमण करने के बाद जब गांव की राजकुमारी काो इसका पता चला तो उसने महिलाओं को पोषाहार के महत्व के बारे में समझाया। उसने महिलाओं को समझाया कि बच्चों को पोषाहार न खिलाकर वह कुपोषण को स्वयं दावत दे रही हैं। राजकुमारी ने उसी वक्त ठान लिया कि वह पोषाहार युक्त नए-नए स्वादिष्ट व्यंजन बच्चों की रुचि के अनुसार उनकी माताओं को बनाना सिखाएगी| राजकुमारी गांव को कुपोषण मुक्त करने की लड़ाई अकेली ही लड़ रही है।

राजकुमारी का मानना था कि कुपोषित बच्चों को सही समय से संदर्भित न किया जाए तो वह जानलेवा भी हो सकता है। उसने गांव की लगभग 45 महिलाओं को स्वादिष्ट पौष्टिक व्यंजन बनाने सिखाए। गृह भ्रमण के दौरान उसने अपनी सहायिका के साथ मिलकर बच्चों, धात्री माताओं एवं गर्भवती महिलाओं के परिवार में जाकर नए-नए पौष्टिक व्यंजन बनाने सिखाए। जैसे-चुकंदर के रस को मिलाकर मीठी पुड़िया, मीठे पुए, नमकीन पुए, खीर, हलवा, सब्जी मिक्स दलिया, खिचड़ी, पकौड़ी, इडली, सांभर, चना मिक्स लड्डू, केक, हरी सब्जियों के रोल, पापड़ी एवं विटामिन सी युक्त खट्टी चटनी आदि व्यंजन बनाने सिखाए। इन व्यंजनों को न केवल महिलाओं ने सराहा बल्कि बल्कि बच्चों ने भी बड़े चाव से खाया|

महिलाओं को कुपोषण के प्रति किया जागरूक

बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए राजकुमारी के पास सुनहरा मौका था। उसने बच्चों की माताओं को हरे, पीले व लाल श्रेणी के साथ बच्चों के वजन के बारे में बताया| उसने अभिभावकों को बताया कि हरे रंग में आने वाले बच्चे सामान्य श्रेणी में आते हैं जो पूरी तरह स्वस्थ हैं। पीला रंग आंशिक कुपोषण की श्रेणी है। लाल रंग की श्रेणी में गंभीर कुपोषितों को रखा जाता है जिसमें बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र पर भर्ती कराने के साथ उपचार की भी आवश्यकता होती है।

उसी समय राज कुमारी ने लगभग 55 आंशिक कुपोषित एवं 15 गंभीर कुपोषित बच्चों को चिन्हित किया| सबसे पहले उसने गंभीर कुपोषित बच्चों के अभिभावकों से बात करके उन्हें जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र पर ले जाने के लिए प्रेरित किया। जो एकल परिवार थे और किसी कारणवश पोषण पुनर्वास केंद्र पर नहीं रुक सकते थे उन महिलाओं को पौष्टिक एवं स्वादिष्ट व्यंजन बनाना सिखाना शुरू किया।

55 बच्चे थे कुपोषित अब 30 रह गया आंकड़ा

मकरंदपुर धाराजीत गांव में आंशिक कुपोषित बच्चों की संख्या 55 थी। ग्रामीणों का मानना है कि राजकुमारी के प्रयासों से अब यह आंकड़ा 30 रह गया है। वहीं, गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या जहां 15 थी, अब तीन हो गई है। वर्तमान में दो कुपोषित बच्चों का इलाज सीएचसी पर करा रही। राजकुमारी ने बताया, ‘मैंने अपने गांव के बच्चों को कुपोषण मुक्त कराने में कुछ हद तक सफलता प्राप्त कर ली है आगे भी यही प्रयास रहेगा कि मेरे इस गांव में एक भी गंभीर कुपोषित बच्चा न हो और जल्द ही हमारा गांव कुपोषण मुक्त गांव की श्रेणी में आ जाए।’

फैक्ट फाइल

– 6300 बच्चे अति कुपोषण से जूझ रहे हैं जिले में
– 46 हजार के करीब बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जिले में
– 52446 गर्भवती महिलाएं जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों पर हैं पंजीकृत

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