मेरी लाश को मेरे पापा छू भी न पाएं... सुसाइड नोट लिखा अधिवक्ता ने कचहरी की 5वीं मंजिल से कूदकर दी जान

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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कानपुर, अमृत विचार। कचहरी में गुरुवार दोपहर अधिवक्ता ने पांचवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। अधिवक्ता के गिरने व तेज चींख सुनकर वकीलों की भीड़ लग गई। सूचना पर पहुंची कोतवाली पुलिस तत्काल अधिवक्ता को उर्सला पहुंचाया, जहां जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। खबर पाकर डीसीपी पूर्वी सत्यजीत गुप्ता, एडीसीपी अंजलि विश्वकर्मा, एसीपी आशुतोष कुमार पहुंचे और कचहरी परिसर में लगे सीसीटीवी फुटेज चेक किया। 

जिसमें अधिवक्ता पांचवें खंड पर टूटी खिड़की की बाउंड्री पर बैठा दिखा। करीब 15 मिनट बाद वह कूद गया। अधिवक्ता के दो पेज के सुसाइड नोट में पिता के प्रति गहरी नाराजगी व नफरत दिखी। सुसाइड नोट में आखिरी में निवेदन के साथ लिखा कि मेरी लाश को मेरे पापा छू भी न पाएं। मैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं करना चाहता, ताकि मेरा परिवार बर्बाद न हो।

बर्रा आठ वरुण विहार निवासी अधिवक्ता राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव का 23 वर्षीय बेटा प्रियांशु पिता के साथ प्रेक्टिस करता था। गुरुवार दोपहर प्रियांशु कचहरी की पांचवी मंजिल पर पहुंचा, जहां टूटी खिड़की की बाउंड्री पर बैठ गया। करीब 15 मिनट तक खिड़की के पास बैठा रहा और फिर कूदकर जान दे दी। आवाज सुनकर अधिवक्ताओं की भीड़ लग गई। साथी अधिवक्ता पुलिस के साथ उसे उर्सला ले गए, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रियांशु के मोबाइल में दो पेज का सुसाइड नोट पुलिस को मिला।

जांच-पड़ताल के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया। पुलिस जांच में सामने आया कि सुसाइड से पहले करीब 12 बजे उसने दो पेज का सुसाइड नोट लिखा। आत्महत्या से 21 मिनट पहले व्हाट्सएप स्टेटस पर सुसाइड नोट लगाया। जिसे अपने पिता व दोस्तों को भी फारवर्ड किया। जब तक परिजन व दोस्त सुसाइड नोट पढ़ते उसकी मौत हो चुकी थी। पुलिस ने मोबाइल कब्जे में लिया है। 

लिखा, मेरी अंतिम इच्छा है सब लोग सुसाइड नोट अंत तक पढ़े

मैं प्रियांशु श्रीवास्तव पुत्र राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव उम्र 23 वर्ष 11 माह 7 दिन। निवासी वरूण विहार का हूं। 23-4-2026 समय दोपहर 12.05 बजे अपने पूरे होशो हवास में बिना किसी जोर-दबाव अपनी पूर्ण सहमति से सुसाइड नोट लिख कर अपनी जान दे रहा हूं। मैने अपनी लॉ की पढ़ाई 2025 में पूरी की है। 

कहानी शुरू होती है मेरे बचपन से, करीब 5 या 6 वर्ष की उम्र से ही मुझे मानसिक यातनाएं मिलनी शुरू हो गई। भविष्य में ऐसी नौबत किसी को न आए। इसके बाद प्रियांशु ने अपनी अब तक की कहानी लिखी। जिसमें उसने जिक्र किया कि पिता हर बार निर्वस्त्र करके घर से भगा देने की धमकी देते थे। पढ़ाई के लिए जरूरत से ज्यादा प्रेशर बनाना, शक की नजरों से देखना, एक-एक मिनट का हिसाब लेना, कहां जा रहे हो, कब आओगे, किसका फोन आया है, क्या बातें की आदि मानसिक टॉर्चर ही है। 

धमकी दी गई, कि अगर हाईस्कूल में नंबर कम आए तो पूरा निर्वस्त्र कर घर से भगा देंगे। रोज घुट-घुट कर मरने से लाख गुना बेहतर है कि एक दिन मरके खत्म होना। आखिर में अभिभावकों से अपील किया कि अपने बच्चों को उतना ही टॉर्चर करें, जितना वो बर्दाश्त कर सकें। लिखा निवेदन है कि मेरी लाश को मेरे पापा छू भी न पाएं। 

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