कालजयी उपन्यास ‘देवदास’ के रचयिता शरतचंद्र
भारत में कई ऐसे यशस्वी साहित्यकार हुए हैं, जिनकी कृतियां विश्व भर में पढ़ी जाती हैं। इन साहित्यकारों में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की गणना प्रथम पंक्ति में की जाती है। आम आदमी को केंद्र में रखकर सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने पर बुने उनके उपन्यास और कहानियां पाठकों में बहुत लोकप्रिय हुईं।
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, एक ऐसे उपन्यासकार हैं, जिन्होंने अपने शब्दों और कुछ अविस्मरणीय लेखन के कारण लोगों के मन-मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ी। उन्हें पश्चिम बंगाल के लोगों के मनोभावों, उनकी रुचियों, परंपराओं तथा उनकी जीवन शैली की गहरी समझ थी। एक विख्यात लेखक, जिनकी स्पष्ट और अविस्मरणीय लेखन की सरल शैली उस समय के नियमित पाठकों को पढ़ने के लिए एक बेहतरीन समाग्री थी।
शरतचंद्र ने अपने उपन्यास और कहानियों में बंगाल के ग्रामीण अंचल में प्रचलित संस्कृति और वहां की जीवन शैली को एक नया आयाम दिया। उनके उपन्यासों और कहानियों के अधिकांश पात्र समाज के सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके आचरण तथा व्यवहार में सादगी तथा भोलापन स्पष्ट रूप से झलकता है।
शरतचंद्र का जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन भागलपुर में अपने मामा के घर में बिताया। 1894 में, उन्होंने टीएन जुबली कॉलेजिएट स्कूल से प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें एफए क्लास में भर्ती कराया गया, लेकिन गरीबी के कारण अपनी आगे की शिक्षा जारी रखने में असमर्थ हो गए।
शरतचंद्र का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी था, इसलिए उन्होंने जीवन के कई क्षेत्रों में कार्य किया। सबसे पहले उन्होंने बनाली एस्टेट में सहायक सेटलमेंट ऑफिसर के रूप में कार्य करना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता के उच्च न्यायालय में एक अनुवादक के रूप में काम किया। फिर उन्होंने बर्मा रेलवे में लेखा विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल कांग्रेस के सक्रिय सदस्य भी रहे। वे भारतीय कांग्रेस द्वारा देश की आजादी के लिए चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लेते थे। बाद में, उन्हें हावड़ा जिला कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को एक ऐसा लेखक माना जाता है, जिन्होंने बंगाल के ग्रामीण परिवेश को अपने लेखन में अच्छी तरह से समाहित किया है। उनके कृतियों में ग्रामीण सार है, क्योंकि इनमें साधारण परिवारों, शहरों से बहुत दूर प्रकृति की गोद में, नदियों, पेड़ों और कृषि भूमि के बीच के जीवनकाल को कहानियों के रूप में दर्शाया गया है। उन्होंने महिलाओं के बारे में बहुत अधिक लिखा और एक पितृसत्तामक समाज में उनकी स्थिति के बारे में स्पष्ट रूप से और ईमानदारी से बताया। उन्होंने धर्म के नाम पर हो रहे सामाजिक भेदभाव, अन्याय और अंधविश्वास के खिलाफ विरोध किया। शरतचंद्र का पहला उपन्यास ‘बड़ीदीदी’ 1907 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उनका उपन्यास ‘बिंदुर छेले’ सन् 1913 में और एक अन्य उपन्यास ‘परिणीता’ 1914 में प्रकाशित हुआ। उनके इन उपन्यासों को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया और उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल हुई।
सन् 2016 में उनका उपन्यास ‘बैकुन्ठेर उइल’ सन् 1917 में ‘देवदास’, ‘श्रीकांत’ और ‘चरित्रहीन‘ प्रकाशित हुए। देवदास और चरित्रहीन उपन्यास के प्रकाशन के बाद शरतचंद्र की गणना देश के चोटी के उपन्यासकारों में होने लगी। सन् 1926 में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘पाथेर दाबी’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का कथानक क्रांतिकारी विषयवस्तु पर आधारित था और पाठकों को आजादी के लिए प्रेरित करता था, इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। अपनी साहित्य यात्रा के दौरान शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने बच्चों के लिए कई कहानियां और उपन्यास लिखे। इनमें ‘रामर शुमाती’ तथा ‘लालू और उनके दोस्त’ जैसी लघु कथाएं शामिल हैं।
उनके उपन्यास् और कहानियों पर सफल फिल्में भी बनाई गईं। इन फिल्मों में ‘देवदास’, ‘परिणीता’, और ‘श्रीकांत’ जैसी फिल्मों ने अपार सफलता अर्जित की और वे दर्शकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुईं। शरतचंद्र को बंगाली साहित्य में योगदान देने के लिए कई पुरस्कार मिले। इनमें सन् 1903 में उन्हें मिला ‘कुंतालिन पुरस्कार’ सबसे महत्वपूर्ण है। सन् 1923 में बंकिम चंद्र चटर्जी को ‘जगत्तारिणी स्वर्ण पदक’ से विभूषित किया गया। सन् 1934 में उन्हे ‘बंगाली संगीत परिषद’ की सदस्यता प्रदान की गई। 16 जनवरी 1938 को उनकी मृत्यु से बंगाल साहित्य को भारी नुकसान हुआ। उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास हिंदी साहित्य की भी अनमोल धरोहर हैं। उनके विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों के लिए उनका सदैव स्मरण किया जाएगा। यह देश और समाज उनका ऋणी रहेगा।
सुरेश बाबू मिश्रा
साहित्य भूषण
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