बरेली की पहचान, देश का गौरव बना CARI : एशिया के पोल्ट्री हब की गौरवगाथा

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Published By Muskan Dixit
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बरेली, अमृत विचारः बरेली का नाम आते ही अक्सर जहन में झुमका या सुरमा आता है, लेकिन वैश्विक पटल पर बरेली की एक और पहचान है। केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई)। इज्जतनगर स्थित यह संस्थान भारतीय पोल्ट्री उद्योग की रीढ़ है। 1939 में एक छोटी सी इकाई से शुरू हुआ यह सफर आज एशिया के सबसे बड़े कुक्कुट अनुसंधान केंद्र के रूप में तब्दील हो चुका है। यहां की मिट्टी में विज्ञान और किसान का वो संगम है, जिसने भारत को अंडा और मांस उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों की कतार में खड़ा कर दिया है।

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विरासत का सफर- 1939 की एक इकाई से 1979 का महासंस्थान

सीएआरआई की नींव वास्तव में 11 मार्च 1939 को रखी गई थी। जब भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के भीतर पोल्ट्री रिसर्च नामक एक छोटी सी इकाई खोली गई। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटा सा विभाग एक दिन पूरे महाद्वीप का मार्गदर्शक बनेगा। 1970 के दशक तक आते-आते, इस विभाग की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई कि यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) ने यहां सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन पोल्ट्री साइंस की स्थापना में सहयोग किया। 1971 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देश में संगठित कुक्कुट अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए एक समन्वित शोध परियोजना शुरू की थी। इसी पहल ने आगे चलकर एक समर्पित राष्ट्रीय संस्थान की जरूरत को मजबूत किया। अंतत 2 नवंबर 1979 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने इसे एक स्वतंत्र पूर्ण संस्थान का दर्जा दिया। आज यह संस्थान न केवल शोध करता है, बल्कि एवियन आनुवंशिकी (एवियन जेनेटिक्स), ब्रीडिंग और पोषण के क्षेत्र में वैश्विक मानक स्थापित कर रहा है।

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सिर्फ मादा चूजे- पोल्ट्री जगत की सबसे बड़ी वैज्ञानिक क्रांति

वर्तमान में पोल्ट्री उद्योग के सामने सबसे बड़ी नैतिक और आर्थिक चुनौती नर चूजों का प्रबंधन है। लेयर फार्मिंग (अंडा उत्पादन) में नर चूजे किसी काम के नहीं होते और उन्हें नष्ट कर दिया जाता है। सीएआरआई इस समय इन-ओवो सेक्सिंग और जेंडर-स्पेसिफिक तकनीक पर काम कर रहा है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसे अंडे विकसित करना है जिनसे केवल मादा चूजे ही पैदा हों। यह शोध सफल होने पर चूजों को नष्ट करने की क्रूरता खत्म होगी। फीड (चारे) की बर्बादी रुकेगी। किसानों की लागत में 40 प्रतिशत तक की कमी आएगी। यह तकनीक न केवल भारत बल्कि वैश्विक पोल्ट्री बाजार के लिए गेम चेंजर साबित होगी।

नस्लों का संसार- कैरीप्रिया से कैरी रेनब्रो तक की कहानी

सीएआरआई ने मुर्गियों की ऐसी प्रजातियां विकसित की हैं जो किसी करिश्मे से कम नहीं हैं। यहां की ब्रीडिंग लैब में वैज्ञानिकों ने अपनी बरसों की मेहनत से मुर्गियों की ऐसी सुपर नस्लें तैयार की हैं। जो आज देशभर के पोल्ट्री व्यवसाय के लिए एक मिसाल बन गई हैं।

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सुनहरे भविष्य की सोनाली और प्रिया

संस्थान की कैरी सोनाली ने 1997 में जब दस्तक दी, तो भूरे रंग के अंडों की मांग पूरी तरह बदल गई। साल भर में 280 अंडे देने की इसकी क्षमता ने किसानों की झोली खुशियों से भर दी। वहीं, कैरीप्रिया ने अपनी अनुकूलन क्षमता से साबित कर दिया कि चाहे गांव की कच्ची मुंडेर हो या शहर का आधुनिक फार्म, वह हर जगह फिट है। मांस उत्पादन के क्षेत्र में कैरी समृद्धि किसी वरदान से कम नहीं है। जहां साधारण मुर्गियों को बढ़ने में वक्त लगता है, वहीं समृद्धि का वजन इतनी तेजी से बढ़ता है कि किसान कम समय में ही मुनाफे का स्वाद चख लेते हैं। संस्थान यहीं नहीं रुका। वैज्ञानिकों ने ''300 प्लस क्लब'' वाली ऐसी नस्लें तैयार की, जो साल में 300 से ज्यादा अंडे देकर भारत में अंडा क्रांति का नेतृत्व कर रही हैं। संस्थान के बाड़ों में सिर्फ उत्पादकता ही नहीं, बल्कि भारत की नस्लीय विरासत भी सुरक्षित है। यहां काले मांस वाला औषधीय कड़कनाथ अपनी धमक दिखाता है, तो लड़ाकू और साहसी असील (पीला और करगार) अपनी मजबूती का लोहा मनवाते हैं। इनके साथ ही कैरी विराट, ब्लैक, चित्तला, सैनहरी, स्वेता, उत्तम और कैरीपर्ल कदाबरी जैसी प्रजातियां पोल्ट्री की दुनिया में विविधता के नए रंग भर रही हैं। गोनयजा फ्लो जैसी नस्लों के साथ सीएआरआई आज न केवल बरेली का गौरव बढ़ा रहा है, बल्कि छोटे किसानों के सपनों को पंख भी दे रहा है। वाकई, ये नस्लें वैज्ञानिकों के ज्ञान और किसानों के परिश्रम के मेल से निकला एक आधुनिक करिश्मा हैं।

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बटेर और गिनी फाउल- ग्रामीण आय का नया विकल्प

मुर्गियों से इतर, सीएआरआई ने बटेर और गिनी फाउल के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया है। बटेर की चार नई किस्में तेजी से बढ़ने वाली, अधिक अंडा देने वाली और कम लागत वाली आज स्टार्टअप्स की पहली पसंद हैं। इसमें गिनी फाउल जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में चकोर के नाम से जाना जाता है, अपनी कठोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। सीएआरआई के शोध ने इसे लो-रिस्क, हाई-रिटर्न बिजनेस मॉडल में बदल दिया है। यह पक्षी न केवल प्रोटीन का बढ़िया स्रोत है, बल्कि इसकी देखभाल में खर्चा न के बराबर है।

ग्रीन एग्स और शाकाहारी अंडे- सेहत का नया पैमाना

आज के दौर में लोग यह जानना चाहते हैं कि वे जो खा रहे हैं, वह कहां से आ रहा है। सीएआरआई एंटीबायोटिक-फ्री उत्पादन पर जोर दे रहा है।

ग्रीन एग्स: ये ऐसे अंडे हैं जिनमें कीटनाशकों या हानिकारक रसायनों का कोई अंश नहीं होता।

शाकाहारी अंडे: यह सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन इसका अर्थ वैज्ञानिक है। जब मुर्गियों को मछली या किसी अन्य पशु-प्रोटीन के बजाय पूरी तरह से प्लांट-बेस्ड (पौधों पर आधारित) आहार दिया जाता है, तो उसे शाकाहारी अंडा कहा जाता है। यह शुद्धता चाहने वाले उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा बाजार तैयार कर रहा है।

नमकीन अंडा- विज्ञान और स्वाद का अनोखा संगम

सीएआरआई के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे अंडे के भीतर नमक का संतुलन बनाया जाता है। इसे नमकीन अंडा कहा जाता है। इसकी शेल्फ-लाइफ सामान्य अंडों से कहीं अधिक होती है। इसे उबालकर तुरंत खाया जा सकता है, अतिरिक्त नमक की जरूरत नहीं होती। यह प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री और सेना के लिए बहुत उपयोगी साबित हो रहा है।

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उद्यमिता की नर्सरी- हजारों को मिला रोजगार

सीएआरआई केवल शोध तक सीमित नहीं है, यह एक ट्रेनिंग हब है। यहां साल में तीन बार लघु औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण और परामर्श में संस्थान किसानों को चूजे पालने से लेकर, बीमारियों से बचाव के टीके और दवाओं तक की जानकारी देता है। इसके साथ ही मेले और जागरूकता के लिए समय-समय पर आयोजित होने वाले मेलों के जरिए संस्थान तकनीक को जमीन तक पहुंचाता है। संस्थान एजुकेशन में यहां पोल्ट्री साइंस में मास्टर डिग्री और डिप्लोमा कोर्स भी कराए जाते हैं, जिससे देश को विशेषज्ञ वैज्ञानिक मिल रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौतियां

बढ़ता तापमान पोल्ट्री सेक्टर के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सीएआरआई ऐसी क्लाइमेट-रेजिलिएंट (जलवायु अनुकूल) नस्लों पर काम कर रहा है जो 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक के तापमान को भी सहन कर सकें। संस्थान का लक्ष्य ऐसी मुर्गियां तैयार करना है जो कम पानी और कम संसाधनों में भी भरपूर उत्पादन दे सकें, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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विज्ञान से समृद्धि की उड़ान

केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान आज बरेली की पहचान को वैश्विक स्तर पर चमका रहा है। यहां हो रहे शोध केवल लैब की फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश के करोड़ों लोगों के पोषण और लाखों किसानों की आर्थिक उन्नति का आधार बन रहे हैं। चाहे वह नमकीन अंडा हो या सिर्फ मादा चूजे का शोध, सीएआरआई ने यह साबित कर दिया है कि भारत में पोल्ट्री का भविष्य सुरक्षित और वैज्ञानिक हाथों में है। सीएआरआई, इज्जतनगर न केवल एक संस्थान है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत का एक जीता-जागता उदाहरण है, जहां विज्ञान परंपरा के साथ मिलकर समृद्धि का रास्ता तैयार कर रहा है।

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सीएआरआई का लक्ष्य उन्नत शोध के माध्यम से पोल्ट्री क्षेत्र को ग्रामीण स्वावलंबन का आधार बनाना है। हम ''सिर्फ मादा चूजे'' और ''क्लाइमेट-रेजिलिएंट'' नस्लों जैसी अत्याधुनिक तकनीकों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि किसानों की लागत घटे और उपभोक्ताओं को सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाला पोषण मिल सके।
डॉ. जगबीर सिंह त्यागी, कार्यवाहक निदेशक, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान बरेली

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