मजदूर दिवस : श्रमिक अधिकार और खोता बचपन
बच्चों की मजबूरी कई बार उन्हें खतरनाक परिस्थितियों में काम करने पर विवश कर देती हैं। कुछ बच्चे पटाखा फैक्ट्री में लगाए जाते हैं, तो कई बच्चे खेतों में मजदूरी करते हैं।
हर वर्ष पहली मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है। यह दिन श्रमिकों के अधिकारों, उनके सम्मान और उनके संघर्षों को याद करने का अवसर है, किंतु इसी अवसर पर यह प्रश्न और तीखा हो उठता है कि क्या हमने उन बच्चों को देखा है, जिनका बचपन मजदूरी के बोझ तले दब गया है? मध्य प्रदेश, जहां देश की बड़ी आदिवासी आबादी निवास करती है, इस प्रश्न को और गहराई देता है। झाबुआ, अलीराजपुर, धार, डिंडोरी, मंडला और बड़वानी जैसे जिलों में बचपन अक्सर समय से पहले ही वयस्कता का बोझ उठाने लगता है। बच्चे परिवार की आय में हाथ बंटाने के लिए खेतों में काम करते हैं, जंगल से संसाधन जुटाते हैं, या शहरों में जाकर निर्माण स्थलों पर मजदूरी करते हैं।
इस समस्या की गंभीरता केवल अनुभवजन्य नहीं, बल्कि आंकड़ों में भी स्पष्ट दिखाई देती है। यूनिसेफ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की संयुक्त रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न हैं, जिनमें से लगभग आधे खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं। देश में 2011 की जनगणना के अनुसार पांच से 14 वर्ष आयु वर्ग के एक करोड़ से अधिक बच्चे किसी न किसी रूप में श्रम में लगे थे और विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
हालिया अभियानों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023–24 के दौरान देशभर में 44,000 से अधिक बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी और वंचित वर्गों से संबंधित थी। मध्य प्रदेश में भी 2024 के दौरान रायसेन जिले से 50 से अधिक आदिवासी बच्चों को जबरन मजदूरी से छुड़ाया जाना इस समस्या की जड़ों की गहराई को उजागर करता है।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो यह समस्या केवल बाल श्रम नहीं, बल्कि जीविका संकट का परिणाम है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि आदिवासी समुदायों में गरीबी का स्तर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। सीमित कृषि भूमि, जंगल आधारित आजीविका का कमजोर होना और रोजगार के अवसरों का अभाव परिवारों को मजबूर कर देता है कि वे बच्चों को भी कमाने के लिए आगे बढ़ाएं।
आदिवासी समुदायों की आर्थिक स्थिति प्रायः कमजोर होती है। ये लोग वनों, पहाड़ों और दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करते हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी होती है। इन समुदायों की आजीविका मुख्यतः कृषि, वनोपज संग्रह, और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर होती है। जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और औद्योगिक विकास के कारण आदिवासियों की पारंपरिक जीविका के स्रोत नष्ट होते जा रहे हैं। इस कारण परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय हो जाती है और बच्चों को भी कम उम्र में ही श्रम कार्यों में लगना पड़ता है।
बच्चों की यह मजबूरी कई बार उन्हें खतरनाक परिस्थितियों में काम करने पर विवश कर देती है। कुछ बच्चे पटाखा फैक्ट़ी में लगाए जाते हैं, तो कई बच्चे खेतों में मजदूरी करते हैं। वहीं कुछ निर्माण स्थलों, ईंट-भट्टों और खदानों में काम करने को मजबूर हो जाते हैं। कई बार वे घरेलू नौकर के रूप में शहरी परिवारों में काम करने के लिए भेज दिए जाते हैं, जहां उनके साथ दुर्व्यवहार और शोषण की घटनाएं आम होती हैं।
कई बार उन्हें न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे दिए जाते हैं और उनके काम के घंटों की कोई सीमा नहीं होती। उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया जाता है और वे कानूनी सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार बचपन की मासूमियत श्रम के कठोर बंधनों में जकड़ जाती है। मौसमी पलायन इस समस्या को और जटिल बना देता है। मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों से हर वर्ष हजारों परिवार गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों की ओर पलायन करते हैं। श्रम विभाग और विभिन्न सामाजिक संगठनों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन परिवारों के साथ जाने वाले बच्चे अक्सर स्कूल से कट जाते हैं और मजदूरी में शामिल हो जाते हैं। इस प्रकार शिक्षा का अधिकार कागजों तक सीमित रह जाता है।
शिक्षा के संदर्भ में स्थिति चिंताजनक है। आदिवासी बहुल जिलों में ड्रॉपआउट दर भी सामान्य से अधिक पाई गई है, विशेषकर प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर। शिक्षा से यह दूरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले गरीबी के चक्र को मजबूत करती है। वे अपने माता-पिता की तरह असंगठित श्रम में फंस जाते हैं। स्वास्थ्य के स्तर पर भी इसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार मध्य प्रदेश में बच्चों में कुपोषण की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जब कुपोषित बच्चे कठोर श्रम में लगते हैं, तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास और अधिक प्रभावित होता है। खदानों, ईंट-भट्टों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले बच्चों को धूल, रसायनों और भारी बोझ के कारण अनेक स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
आवश्यकता इस बात की है कि आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं, ताकि पलायन कम हो और परिवार स्थिर रह सकें। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, जिससे परिवारों पर आर्थिक दबाव कम हो और बच्चों को काम करने की आवश्यकता न पड़े। वहीं बाल श्रम के खिलाफ सख्त कार्रवाई और समुदाय स्तर पर जागरूकता अभियान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि बाल श्रम एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहन सामाजिक-आर्थिक समस्या है। इसके लिए शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और जागरूकता के समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। मजदूरी करता हर बच्चा हमारे समाज के सामने एक मौन प्रश्न रखता है क्या उसका बचपन भी उतना ही मूल्यवान है, जितना किसी और का? इस प्रश्न का उत्तर केवल नीतियों में नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताओं में छिपा है। जब तक हम यह सुनिश्चित नहीं कर लेते कि हर बच्चा स्कूल में हो, सुरक्षित हो और अपने सपनों को जीने का अवसर पा सके, तब तक विकास की कोई भी कहानी अधूरी ही रहेगी।
मजदूर दिवस का वास्तविक अर्थ उन बच्चों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी स्मरण है , जिन्हें परिस्थितियों ने समय से पहले मजदूर बना दिया है। यदि हम सच में श्रम के सम्मान की बात करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा मजदूरी करने के लिए मजबूर न हो। संध्या राजपुरोहित दो दशक से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा कार्य से सम्बद्ध है। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
