कहां गुम गया अजूबे कारनामे वाला सर्कस

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Published By Anjali Singh
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संसार में सर्कस का इतिहास, अति प्राचीन है। सर्कस का प्रादुर्भाव ईसा पूर्व पहली शताब्दी में हुआ माना जाता है, जब लोग एक विशेष स्थान पर इकट्ठा होकर घोड़ों की दौड़ का आनंद लेते थे। जूलियस सीजर्स के समय रोम में घुड़दौड़ के साथ रथदौड़ भी लोग देखने-दिखाने लगे थे। ईसा पश्चात छठी शताब्दी में इटली में जब ईसाइयों का आधिपत्य स्थापित हुआ तो उन्होंने सर्कस में नए किन्तु एक दर्दनाक खेल को भी शामिल कर लिया। वे न्यायालय से मौत की सजा पाए व्यक्ति को, लोगों के सामने खूख्वार नरभक्षी जंगली जानवरों के पिजड़े में डाल देते थे और जब वह नरभक्षी जानवर उस व्यक्ति से लड़ता और फिर टुकड़े-टुकड़े करता तो सर्कस देखने आए लोग सिहर कर खड़े हो जाते। काफी वर्षों तक सर्कस का यही रूप प्रचलित रहा तो धीरे-धीरे लोगों को इस खेल से घृणा होने लगी।- शिवचरण चौहान 

भारत में सर्कस का प्रादुर्भाव

सर्कस की दुनिया को नया मोड़ सन् 1768 ई. में मिला, जब इंग्लैंड की सेना के सेनापति फिलिप एस अली तथा उसके साथी च्यूली ने मिलकर घोड़ों की पीठ पर बैठकर करतब दिखाने शुरू किए। एस्टली, एक गोल घेरे के मैदान में घोड़े की पीठ पर बैठकर तरह-तरह के करतब दिखाता था। यह खेल इंग्लैंड में इतना लोकप्रिय हुआ कि 1782 में एस्टली के एक अन्य साथी ह्यूज ने रायल सर्कस नाम से एक सर्कस कंपनी ही बना डाली। तभी से इस अनोखे खेलों का नाम सर्कस पड़ा। भारत तथा पड़ोसी देशों में सर्कस का प्रादुर्भाव कब हुआ ठीक से नहीं कहा जा सकता, किंतु यहां की ‘नट’ और ‘करनट’ जातियां घूम-घूम कर गांवों में अनोखें खेल दिखाया करती थीं। वैसे भारत में सर्कस का जन्म 19 वीं शताब्दी के आखिरी दशक में हुआ माना जाता है, जब एक विदेशी सर्कस कंपनी भारत आई और उसने मुंबई में एक स्थान पर सर्कस लगाया। इस कंपनी के एक कलाकार विलियम शायनी को घोड़ों के करतब देखने के लिए मुंबई क्या पूरे महाराष्ट्र की जनता उमड़ पड़ी थी। शायनी को अभिमान था कि उसके जैसे करतब भारत में कोई नहीं दिखा सकता है। उसके इस घमंड को कुरंदाबाद (कोल्हापुर) के राजा की सेना के घोड़ों के सईस पंत विनायक छत्ते ने तोड़ा। छत्ते ने सर्कस के मैदान में शायनी का घोड़ा छीनकर ऐसे करतब दिखाए कि खुद शायनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली। वह आग को जलते गोले से घोड़े समेत निकल जाता था। छत्ते ने प्रथम सर्कस कम्पनी ‘छत्तेस न्यू इंडियन सर्कस’ स्थापित की। इसके बाद रायल, ताराबाई, कमला सर्कस कंपनियां आईं।

सर्कस को भारत में विकसित करने व लोकप्रिय करने का श्रेय केरल के तेल्लिचेरी गांव के जिमनास्ट कन्निकणन को है। कन्निकणन ने अपने गांवों के लड़के-लड़कियों को एकत्र कर उन्हें शारीरिक करतबों में ऐसा प्रशिक्षित किया कि देश-विदेश से उसके द्वारा प्रशिक्षित कलाकारों की मांग होने लगी। कन्निकणन के सहयोग से ही अमर सर्कस, भारत सर्कस तथा ओरियंट सर्कस 

विदेश में भी लोकप्रिय है सर्कस

कंपनियों ने विदेशों तक में अपने तम्बू गाड़े व अपनी पताकाएं फहराईं। एक समय भारत में करीब पांच सौ छोटी बड़ी सर्कस कम्पनियां थीं जो हाट, बाजारों, मेलों, ठेलों, शहरों में करतब करती थीं। आज मुश्किल से कुछ सर्कस बची है। भीरबाट, कमला, अपोलो, भारत जंबो कंपनियां आईं। एक जमाने में मशहूर कमला सर्कस  के बहुत से कलाकार मर गए और भारत में सर्कस कंपनियां चलाने में लोगों के रुके नहीं रही। सर्कस, एशिया, यूरोप, अमेरिका, इटली, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों में बहुत लोकप्रिय खेल रहा है। जर्मनी के घुमक्कड सर्कस कलाकार पूरी दुनिया भर में मशहूर थे। सर्कस को आधुनिक रूप देने अमेरिका का नाम प्रमुख है। अमेरिका में ही सबसे पहले जानवरों शेर, चीता, भालू, हाथी, कुत्तों, घोड़ों, तोतों आदि के अद्भुत करतब दिखाने शुरू किए। आंबर्ग, पाला कलाकार था जो शेर के मुंह में अपना सिर घुसेड देता था। तब के सोवियत संध में सर्कस ने नए-नए करतबों का विकास हुआ। जोकरों का प्रयोग, सर्कस में रूस की ही देन है। बौने, लंबे, मोटे जोकर विदूषक अपने करतबों से खूब हंसाते है। लड़कियों का अंग तोड़ना तथा झूले का आश्चर्यजनक खेल, आज सभी सर्कसों में दिखाया जाता है.ये भी अमेरिका की देन है।  जानवरों के खेल, करतब मौत का कुआ. शेर से कुश्ती सहित अनेक अद्भुत खेल, आज सर्कस में दिखाए जाते हैं, जिन्हें देखकर दर्शक दांतों तले अंगुली दबा लेते है।

नए सिरे से खड़ी होती सर्कस कंपनियां

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एक समय आया था जब सिनेमा, भारत में बहुत लोकप्रिय हो गया था और लगा था कि शायद अब सर्कस का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ क्योंकि सर्कस ने भी समय के अनुसार आधुनिकतम रूप ले लिया। आज सर्कस कंपनियां कम है, जिन्हें सरकारी मदद देकर सामाजिक प्रोत्साहन देकर और बढ़ाया जा सकता है। जहं सर्कस लगता है, वहां सर्कस गांव स्थापित हो जाता है। सर्कस कंपनियां, अपना डेरा-तंबू, सामान, हाथी, घोड़ों, शेरों के पिंजड़ों को लाने ले जाने के लिए अपने वाहन रखती हैं। कई कंपनियां तो रेल के डिब्बे भी प्रयोग में लाती हैं। सर्कस में जानवरों के प्रदर्शन पर रोक लगने से सर्कस को झटका लगा है। सर्कस में जानवरों के रोक लग जाने पर निश्चित तौर से सर्कस के मालिकों और कलाकारों को झटका लगा है। आज भारत में कस्बों मेलों शहरों में कहीं-कहीं सर्कस कंपनियां अपने करतब करते दिखाई दे जाती हैं। मोबाइल गेम के कारण वे बच्चे सर्कस देखने कम आते हैं। पर सर्कस अब नए रूप में आ रहा है। दुनियाभर में सर्कस कंपनियां नए सिरे से खड़ी हो रही है। सर्कस कंपनियों में अब जादूगर भी अपने खेल दिखाने लगे हैं।