छापा-चित्रों में अतियथार्थवादी छाप : मनोहर लाल भूगड़ा

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Published By Anjali Singh
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इसे भारतीय कला जगत की विसंगति ही कहा जाना चाहिए कि आज़ादी के बाद से हमारी आधुनिक या समकालीन कला महानगर-केंद्रित रही है। इसका परिणाम यह रहा कि हमारे जिन वरिष्ठ कलाकारों या कला-गुरुओं ने महानगर-परिक्रमा से परहेज रखा, उन्हें अपने ही शहर में वह ख्याति नहीं मिल पाई, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। ऐसे ही कला-गुरुओं में एक हैं मनोहर लाल भूगड़ा। लखनऊ कला महाविद्यालय में अपनी शिक्षा से लेकर अध्यापन-काल तक उन्होंने प्रिंटमेकिंग या छापा-चित्रण जैसे जटिल माध्यम की तकनीकों को साधते हुए कला-सृजन जारी रखा। वर्ष 1988/89 के दौरान मुझे उनके सान्निध्य का अवसर मिला था। जाहिर है, तब उनके छापा-चित्रों और उसकी तकनीक ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। -सुमन कुमार सिंह

समकालीनों से अलग पहचान

लखनऊ ही नहीं, देश के समकालीन ग्राफिक कलाकारों में मनोहर लाल भूगड़ा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1 अगस्त 1947 को जन्मे भूगड़ा ने लखनऊ के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट से 1968 में पंचवर्षीय डिप्लोमा तथा 1971 में छापा-चित्रण (प्रिंटमेकिंग) में पोस्ट डिप्लोमा प्रथम श्रेणी में प्राप्त किया। आगे की उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए उन्हें 1973 से 1975 के बीच शांतिनिकेतन में प्रख्यात प्रिंटमेकर सोमनाथ होर के निर्देशन में अध्ययन का अवसर मिला।

इसके उपरांत 1979 से 1981 तक भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग के अंतर्गत ‘प्रिंटमेकिंग के विभिन्न माध्यमों और सामग्रियों का अन्वेषण’ परियोजना पर शोध-फेलो के रूप में उन्होंने छापाकला की नई संभावनाओं पर गंभीर प्रयोग किए। मनोहर की रचनात्मकता का मूल आधार उनकी प्रयोगधर्मी दृष्टि रही है। उन्होंने कोलोग्राफ, टोनल वैरिएशन, एचिंग, ड्राई प्वॉइंट, एंग्रेविंग, विस्कोसिटी, डीप एचिंग, एल्युमिनियम प्लेट पर ड्राई प्वॉइंट, लिथोग्राफी और सॉफ्ट-इफेक्ट जैसी विविध तकनीकों में कार्य किया। यह बहुआयामी तकनीकी दक्षता उन्हें अपने समकालीनों से अलग पहचान देती है। 

पाब्लो पिकासो के नियो-क्लासिकल के दौर की याद

विषय-वस्तु की दृष्टि से उनके छापा-चित्रों में नारी-आकृति प्रमुखता से उभरती है। श्वेत-श्याम संयोजन के माध्यम से वे एक रहस्यमय और गहन मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचते हैं। उनकी आकृतियां मांसल, सुदृढ़ और त्रिआयामी प्रभाव लिए होती हैं, जिनमें प्रकाश और अंधकार का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मानो वे यह संकेत दे रहे हों कि प्रकाश हमें प्रकाशित करता है, जबकि अंधकार हमें सजग बनाता है और दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। उनकी नारी-आकृतियां कहीं-कहीं पाब्लो पिकासो के नियो-क्लासिकल और यथार्थवादी दौर की याद दिलाती हैं, किंतु भूगड़ा की दृष्टि पूरी तरह भारतीय संदर्भों में रची-बसी है।

आकृतियों में लयात्मकता, ऊर्जा और आंतरिक तनाव का संतुलित संयोजन दिखाई देता है। यह ऊर्जा केवल दृश्य नहीं, बल्कि चेतन और अचेतन मन की गहराइयों से उपजती प्रतीत होती है। मनोहर के छापा-चित्रों की एक विशिष्ट विशेषता उनका अतियथार्थवादी आयाम है। यद्यपि आकृतियों की मूल संरचना यथार्थपरक होती है, किंतु उनके मुख-भाग, अंगुलियों या अन्य अंगों में किए गए विकृत एवं कल्पनाशील हस्तक्षेप दर्शक को एक मनोवैज्ञानिक और स्वप्निल संसार में ले जाते हैं। यह वह बिंदु है, जहाँ कला मूर्त से अमूर्त की ओर अग्रसर होती है और पुनः एक नए रूप में मूर्तता ग्रहण करती है। इस प्रक्रिया में सत्य और स्वप्न के बीच का अंतर मिटता हुआ प्रतीत होता है।

रंगों के माध्यम से लयात्मकता और संगीतात्मक प्रभाव

प्रतीकों का प्रयोग भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण पक्ष है। सर्प, पक्षी, सूंड और मछली जैसे रूपांकनों के माध्यम से वे भारतीय पौराणिक और सांस्कृतिक अर्थ-संदर्भों को जोड़ते हैं। सर्प भय, शक्ति और सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है; पक्षी आकाश और पृथ्वी के मध्य दैवीय सेतु; सूंड शक्ति और स्थायित्व का द्योतक; जबकि मछली जीवन और लय का संकेत देती है। इन प्रतीकों के माध्यम से उनके चित्र एक गहन सांस्कृतिक संवाद स्थापित करते हैं। रंगों के प्रयोग में भी उनकी विशिष्टता स्पष्ट है।

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टरक्वॉइज ब्लू, वेरिडियन ग्रीन और लाल रंग के प्रति उनका विशेष आकर्षण रहा है, जिन्हें वे गहरे पृष्ठभूमि रंगों और भूरे टोन के साथ संयोजित करते हैं। इनके बीच उभरता श्वेत रंग एक स्पंदन उत्पन्न करता है, जो पूरी रचना में जीवन का संचार करता है। वे केवल रेखाओं से ही नहीं, बल्कि रंगों के माध्यम से भी लयात्मकता और संगीतात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मनोहर लाल भूगड़ा का योगदान केवल एक कलाकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक शिक्षक के रूप में भी महत्वपूर्ण रहा है।

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उन्होंने 1976 से 2010 तक लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध कला एवं शिल्प महाविद्यालय में अध्यापन किया और अनेक विद्यार्थियों को प्रिंटमेकिंग की जटिल तकनीकों से परिचित कराया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे सक्रिय रूप से सृजनरत हैं। प्रख्यात कलाकार और पूर्व प्राचार्य जय कृष्ण अग्रवाल के अनुसार, लखनऊ में क्रिएटिव प्रिंटमेकिंग विभाग की स्थापना और विकास में मनोहर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने तकनीकी उत्कृष्टता और प्रयोगधर्मिता के माध्यम से न केवल स्वयं को स्थापित किया, बल्कि अन्य छात्रों को भी प्रेरित किया। उस दौर में, जब प्रिंटमेकिंग को पर्याप्त मान्यता नहीं मिल रही थी, मनोहर ने इस माध्यम की असीम संभावनाओं को सिद्ध किया। अंततः मनोहर लाल भूगड़ा की कला-यात्रा हमें यह समझाती है कि प्रिंटमेकिंग केवल तकनीकी कौशल का माध्यम नहीं, बल्कि गहन संवेदनशीलता, प्रतीकात्मकता और वैचारिक गहराई का क्षेत्र भी है। उनकी कृतियांन केवल दृश्य-सौंदर्य का अनुभव कराती हैं, बल्कि दर्शक को एक गहरे आत्मिक और मनोवैज्ञानिक संवाद में भी ले जाती हैं।