AIMPLB का बड़ा बयान, कहा- वंदे मातरम मुसलमानों को कबूल नहीं, धार्मिक आजादी पर हमला

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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कानपुर, अमृत विचार। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भारत की संविधान सभा के उस फैसले को सख्ती से नामंजूर कर दिया है जिसके तहत वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत जन-गण-मन से तुलना करते हुए इसके सभी 6 छंद (अंश) को अनिवार्य करार दिया है और तमाम सरकारी व शिक्षण संस्थानों के कार्यक्रमों में जन-गण मन से पहले पढ़ने को जरुरी बनाने का ऐलान किया है।

बोर्ड ने इसे संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता, लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉक्टर सैयद कासिम रसूल ने 7 मई गुरुवार को जारी अपने बयान में सरकार से मांग की है कि तुरंत इस फैसले को वापस लिया जाए। उन्होंने कहा है कि एक लोकतांत्रिक मुल्क में इस प्रकार जबरन किसी पर ऐसा कुछ थोपा नहीं जा सकता है।

वंदेमातरम के कई छंद में दुर्गा और विभिन्न देवी देवताओं के पूजन का तसव्वर (सोचना) मौजूद है जो मुसलमानों के धार्मिक पहलुओं से बिल्कुल अलग है। इस्लाम सिर्फ एक अल्लाह के इबादत की तालीम देता है और इस प्रकार के किसी भी शिर्क को कतई स्वीकार नहीं करता। डॉ. इलियास ने कहा है कि कांग्रेस ने 1937 में रवींद्र नाथ टैगोर से सलाह मशविरा के बाद ये तय किया था कि वंदेमातरम के शुरू के सिर्फ दो छंद ही पढ़े जाएंगे।

बाकी छंद सभी समुदाय के लिए काबिल-ए-कबूल नहीं है। इसी के मद्देनजर 1950 में भारत की संविधान सभा ने सिर्फ दो छंद को राष्ट्रीय गीत के तौर पर स्वीकार किया था। ऐसे में तमाम 6 छंद को अनिवार्य करार देना, एक खतरनाक कदम है। सरकार को चाहिए कि वह मुल्क के संवेदनशील धार्मिक मामलों को सिसायी उद्देश्य के लिए प्रयोग करने से बाज आये। ऐसे फैसले मुल्क के हित में नहीं हैं।

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