इमोशनल ईटिंग बिगाड़ सकती है सेहत की सेटिंग, स्वस्थ जीवन का बन रहा सबसे बड़ा दुश्मन
इंदु सिंह, अमृत विचारः कुछ लोग भोजन को जीने के लिए आवश्यक मानते हैं, परंतु भोजन के लिए नहीं जीते यह दृष्टिकोण ही एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अलग करता है। उनकी सोच किस तरह की है और वह अपने स्वास्थ्य और भोजन को किस तरीके से एक दूसरे से जोड़कर अपने आपको स्वस्थ रख पाते हैं। किसी के लिए भोजन इतना जरूरी होता है कि वह हमेशा हर दिन नए-नए तरह के भोजन को खाने के प्रति लालायित रहते हैं और घर पर भी स्वादिष्ट भोजन बनवाने पर जोर देते हैं। इसके अलावा भी बाहर भी जहां कहीं भी जाते हैं, तो जहां सबसे अच्छा भोजन मिलता है, उस जगह को ही पसंद करते हैं। यही नहीं जब घर पर आते हैं, तो हाथ में कुछ न कुछ लेकर ही घर वापस लौटते हैं।
क्या है इमोशनल ईटिंग
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कुछ लोग स्ट्रेस और नेगेटिव इमोशंस से उबरने के लिए खाने को सबसे आसान और अच्छा जरिया मान बैठते हैं। ऐसी सिचुएशन में स्ट्रेस होते ही कुछ खाने की क्रेविंग होने लगती है। ऐसे में ऑनलाइन पिज्जा या जंक फूड ऑर्डर करते हैं या फिर फ्रीज में रखी आइसक्रीम चॉकलेट खंगालना शुरू कर देते हैं, लेकिन इतना सब कुछ खाने के बाद भी सेल्फ सेटिस्फेक्शन नहीं होता और सिर्फ पछतावे का दौर शुरू हो जाता है। दरअसल इसे ही इमोशनल ईटिंग कहते हैं। काम के तनाव से लेकर फाइनेंशियल क्राइसिस तक, हेल्थ के इशू से लेकर लगातार बिगड़ रहे रिश्तो तक, इनमें से कई इमोशनल ईटिंग के कारण हो सकते हैं।
खाने का स्वभाव पर प्रभाव
लोगों के स्वभाव का प्रभाव भी भोजन पर पड़ता और भोजन से ही लोगों का स्वभाव भी बदलता है, तो भोजन और स्वभाव एक दूसरे के पूरक होते हैं। हम जैसा अनाज खाते हैं वैसा ही हमारे भीतर हमारा तन और मन भी निर्मित होता है, जिसके आधार पर आयुर्वेद में राजसिक, सात्विक और तामसिक भोजन श्रेणियां बनाई गई हैं। राजसी भोजन के अंतर्गत ऐसे भोजन को रखा गया है, जो कि मिर्च-मसालों और प्याज-लहसुन से युक्त होता एवं राजसी प्रवृत्ति के लोग खाना पसंद करते हैं। वही सात्विक भोजन साधु, संत, ऋ षि, मुनि, महात्माओं को पसंदीदा होता है, जिसमें कम मसाले का सादा भोजन प्राथमिक होता है। इसी तरह तामसिक में मांसाहारी व विषम आहार आता है, जो तामसिक वृत्ति के लोगों को प्रिय होता है। यहां पर राजसिक, सात्विक और तामसिक केवल भोजन ही नहीं आदमी की प्रवृत्तियां भी बताई गई हैं। राजसिक भोजन करने वाले ज्यादातर राजसिक वृत्ति के होते हैं तो सात्विक भोजन करने वाले सात्विक और तामसिक वाले तामसिक वृति के माने जाते हैं। इस तरह भोजन का चुनाव हमारे स्वभाव और हमारी पसंद पर भी निर्भर करता है तो किसी भोजन को पसंद करना और अनावश्यक रूप से उसे खाना दोनों में बहुत अंतर होता है। भोजन करना हम सबके लिए जरूरी है परंतु कब, कैसे, और कितना भोजन करना यह सबको ज्ञात नहीं होता है। कुछ लोग खुशी, दुख, हंसी, रोना हर एक भाव को भोजन से जोड़कर देखते हैं। उनको यदि कोई भी शुभ समाचार प्राप्त हो तो वह अपने परिवार और मित्र मंडली के साथ दावत का आयोजन करते हैं जहां पर तरह-तरह के मिष्ठान और पकवान बनाकर सब लोग मिलकर खाते हैं। इसी तरह यदि परिवार में कोई गम या दुख का अवसर हो तब भी भोजन के बिना काम नहीं चलता है तो इस तरह हम देखते हैं कि, हमारे भीतर की भावनाओं का भी भोजन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
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भोजन और भावनाओं का संबंध
कुछ लोग इतने ज्यादा संवेदनशील और भावुक होते हैं कि वह यदि उदास हो या क्रोधित हो दोनों ही स्थितियों में बहुत अधिक खाना शुरू कर देते है, जिसे इमोशनल ईटिंग कहा जाता है, जिस पर खाने वाले का कोई भी नियंत्रण नहीं होता है। अतः इस तरीके की जो खाने की आदत होती है वह बहुत अधिक नुकसान पहुंचती है। जिस व्यक्ति का अपनी संवेदनाओं पर कोई भी नियंत्रण नहीं होता। वह उन संवेदनाओं के उतार-चढ़ाव से इतना अधिक प्रभावित होता है कि वह उसे भोजन के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास करता है। इसलिए आपने देखा होगा कि जब कुछ लोग बहुत अधिक दुखी होते हैं, तो वह ज्यादा भोजन करते हैं, वहीं उनकी खुशी भी उनको अत्यधिक भोजन करने से रोक नहीं पाती है। यह दोनों ही स्थितियां किसी के भी लिए सही नहीं है, क्योंकि इस दौरान किया गया अतिरिक्त भोजन उनके स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी सही नहीं होता है। हर स्थिति और परिस्थिति में यदि व्यक्ति अपने भोजन को संयमित और संतुलित रखें तब वह हमेशा स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है।
इमोशनल ईटिंग की वजह
इमोशनल ईटिंग की कई वजह हो सकती हैं। कभी-कभी व्यक्ति बहुत अधिक बोर होने या फिर डिप्रेशन से घित होने पर भी भोजन के प्रति झुक जाता है और उसे समझ में नहीं आता कि वह इस स्थिति में क्या करें तो भोजन करने लगता है। यदि आपको भी ऐसा ही महसूस होता है और आप अपनी भावनाओं के अधीन होकर अधिक भोजन करने लगते हैं, तब पहले तो इस स्थिति को समझने का प्रयास करें। क्योंकि एक स्वाभाविक भूख और किसी इमोशन के कारण होने वाली तीव्र इच्छा एकदम भिन्न होती है।
यदि हमने इन दोनों में भेद करना सीख लिया तो भी हम अतिरिक्त या अनाप-शनाप खाने से बच सकते हैं। फिर भी यदि हमारा अपनी भावनाओं और सोच पर नियंत्रण नहीं और हम भोजन के प्रति उत्सुक हो रहे हैं, तब ऐसी स्थिति में अपनी इमोशनल ईटिंग को नियंत्रित करने के लिए हमें जब भी कभी किसी भी वजह से चाहे वह गुस्सा हो, अवसाद हो, चिंता हो, तनाव हो, खुशी हो या उदासी हो। हम यदि कुछ भी खाना-पीना पसंद कर रहे हैं, तो कम से कम यह देखने का प्रयास करें कि जो भी हम खाने जा रहे हैं, वह हमारी सेहत के लिए लाभप्रद हो। इस तरीके से हम अपनी इमोशनल ईटिंग को काफी हद तक स्वस्थ तरीके से नियंत्रित कर सकते हैं। यदि आप अपने आपको बहुत अधिक उदास या तनाव युक्त महसूस कर रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में सबसे पहले अपने परिवार रिश्तेदारों या मित्रों के साथ अपनी उसे मानसिक स्थिति को साझा करें और उससे बातचीत करें तो इस तरीके से भी आपका ध्यान भोजन से हट सकता है।
इसके अतिरिक्त आप यदि फिर भी अपने आपको नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, तो कोशिश करें कि बाहर किसी गार्डन में जाकर घूमना शुरू कर दें या फिर किसी भी तरीके की शारीरिक क्रिया करने लगे। वर्तमान समय में सभी व्यक्तियों के जीवन में बहुत अधिक संघर्ष, तनाव और रिश्तो में परेशानियां हैं, जिनसे उबरने के लिए वह अक्सर, भोजन का सहारा लेने लगते हैं और बाद में बहुत पछताते हैं। यह अचानक होने वाली क्रेविंग बाद में उन्हें गिल्टी फील करवाती है, इसलिए इस पर काबू पाना बहुत जरूरी होता है। बाद में पछताने से अच्छा है कि हम शुरुआत में ही अपनी भूख को समझें कि यहां प्राकृतिक है या फिर इसके पीछे इमोशन से जुड़ी हुई कोई वजह है।
