सैलरी से ज्यादा बढ़ रही है ईएमआई

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Published By Deepak Mishra
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भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रही है। इन चमकते आंकड़ों के पीछे एक ऐसी सच्चाई भी छिपी है, जिस पर अब गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।

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रजत मेहरोत्रा,
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

 

भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रही है। शेयर बाजार नई ऊंचाइयों को छू रहा है, डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने क्रांति ला दी है और उपभोग आधारित विकास मॉडल को देश की आर्थिक शक्ति माना जा रहा है, लेकिन इन चमकते आंकड़ों के पीछे एक ऐसी सच्चाई भी छिपी है, जिस पर अब गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। सवाल यह है कि क्या भारत धीरे-धीरे ‘Salary Economy’ से ‘Debt Economy’ की ओर बढ़ता जा रहा है?

आज भारत में स्थिति यह बनती जा रही है कि वेतन आने से पहले ईएमआई कटने लगी है और बचत करने से पहले खर्च तय होने लगे हैं। एक समय था, जब भारतीय परिवार अपनी आय के अनुसार खर्च करने और बचत को प्राथमिकता देने के लिए जाने जाते थे। ‘पहले बचत, फिर खर्च’ भारतीय मध्यम वर्ग की आर्थिक संस्कृति का हिस्सा था, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब ‘पहले खर्च, बाद में भुगतान’ की मानसिकता विकसित हो रही है। क्रेडिट कार्ड, ईएमआई, पर्सनल लोन और ‘Buy Now Pay Later’ जैसी सुविधाओं ने उपभोग को आसान तो बनाया है, लेकिन साथ ही लोगों को कर्ज के जाल में भी धकेलना शुरू कर दिया है।

भारतीय रिजर्व बैंक और विभिन्न वित्तीय रिपोर्टों के अनुसार भारत में घरेलू कर्ज तेजी से बढ़ रहा है, जबकि बचत दर लगातार घट रही है, जो भविष्य की आर्थिक स्थिरता के लिए चेतावनी संकेत माना जा रहा है। हाल के वर्षों में भारत का घरेलू कर्ज बढ़कर जीडीपी के लगभग 41–42 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि वर्ष 2021 में यह करीब 36 प्रतिशत था। यह दर्शाता है कि भारतीय परिवार अब अपनी जरूरतों और जीवनशैली को बनाए रखने के लिए पहले की तुलना में अधिक ऋण पर निर्भर होते जा रहे हैं। 

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि घरेलू कर्ज का बड़ा हिस्सा अब उत्पादक निवेश के बजाय उपभोग आधारित खर्चों के लिए लिया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार भारत में कुल घरेलू ऋण का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा गैर-आवासीय ऋणों का है, जिसमें पर्सनल लोन, उपभोक्ता ऋण और क्रेडिट कार्ड शामिल हैं। यानी अब कर्ज केवल घर खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, यात्रा, लग्जरी वस्तुओं और दैनिक उपभोग तक पहुंच चुका है।

आज शहरी भारत का एक बड़ा वर्ग अपनी मासिक सैलरी का महत्वपूर्ण हिस्सा ईएमआई चुकाने में खर्च कर रहा है। घर की ईएमआई, कार लोन, मोबाइल फोन की ईएमआई, क्रेडिट कार्ड बिल और व्यक्तिगत ऋण ने वेतनभोगी वर्ग की वित्तीय स्वतंत्रता को सीमित कर दिया है। कई युवाओं की स्थिति ऐसी हो गई है कि महीने की सैलरी आने से पहले ही उसका अधिकांश हिस्सा विभिन्न देनदारियों में बंट चुका होता है। क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में सबसे तेजी से बढ़ने वाले कर्ज बन चुके हैं। 

पिछले कुछ वर्षों में क्रेडिट कार्ड ऋणों में 25 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल लेंडिंग ऐप्स और फिनटेक कंपनियों ने कर्ज लेने की प्रक्रिया को इतना आसान बना दिया है कि अब कुछ मिनटों में ऋण उपलब्ध हो जाता है, लेकिन यही आसानी भविष्य में आर्थिक संकट का कारण भी बन सकती है। कई युवा बिना लंबी अवधि के वित्तीय प्रभाव को समझे, तत्काल उपभोग के लिए कर्ज ले रहे हैं।

इस बदलाव के पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। सोशल मीडिया ने दिखावटी जीवनशैली को बढ़ावा दिया है। महंगे मोबाइल फोन, विदेशी यात्राएं, लग्जरी कारें और ब्रांडेड वस्तुएं अब ‘जरूरत’ से ज्यादा ‘स्टेटस सिंबल’ बन चुकी हैं। युवा वर्ग अपनी आय से अधिक खर्च कर रहा है, ताकि वह डिजिटल दुनिया में खुद को सफल और आधुनिक दिखा सके। यही कारण है कि कई लोग निवेश और बचत से अधिक उपभोग और तात्कालिक सुख को प्राथमिकता देने लगे हैं। 

भारत जैसे विकासशील देश की आर्थिक स्थिरता लंबे समय तक घरेलू बचत पर आधारित रही है। भारतीय परिवारों की बचत दर हमेशा देश की आर्थिक मजबूती का आधार मानी जाती थी, लेकिन अब यह बचत लगातार घट रही है। पिछले एक दशक में घरेलू बचत दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है और यह हाल के वर्षों में लगभग 18 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। वहीं सकल घरेलू बचत दर भी पिछले दशक में 34 प्रतिशत से घटकर करीब 30 प्रतिशत के आसपास आ गई है। यह संकेत देता है कि भारतीय समाज धीरे-धीरे बचत आधारित अर्थव्यवस्था से उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि जब किसी देश की बड़ी आबादी अत्यधिक कर्ज में डूब जाती है, तो उपभोग आधारित विकास लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह पाता। शुरुआत में कर्ज से बाजार में मांग बढ़ती है, लेकिन समय के साथ ईएमआई का बोझ उपभोग क्षमता को कम कर देता है। यही स्थिति कई विकसित देशों में आर्थिक संकट का कारण बनी थी। भारत को इस अनुभव से सीख लेने की आवश्यकता है। इसके अलावा, नौकरी की अनिश्चितता और बढ़ती महंगाई ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। 

निजी क्षेत्र में रोजगार स्थिर नहीं हैं, वहीं स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की लागत लगातार बढ़ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के बढ़ते प्रभाव ने भी व्हाइट कॉलर नौकरियों को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। ऐसे में कई परिवार अपनी आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए भी कर्ज का सहारा लेने लगे हैं। यह संकेत देता है कि आर्थिक विकास के बावजूद आम लोगों की वास्तविक वित्तीय स्थिति उतनी मजबूत नहीं हो रही, जितनी आंकड़ों में दिखाई देती है।

यह भी सच है कि ऋण व्यवस्था किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यदि जिम्मेदारी से उपयोग किया जाए, तो कर्ज आर्थिक विकास और जीवन स्तर सुधारने में सहायक हो सकता है। घर खरीदने, व्यवसाय शुरू करने या शिक्षा प्राप्त करने के लिए लिया गया ऋण उत्पादक निवेश माना जाता है। समस्या तब शुरू होती है जब ऋण उपभोग आधारित दिखावे और तात्कालिक इच्छाओं को पूरा करने का माध्यम बन जाता है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)

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