Moradabad: संभल हिंसा मामले में तत्कालीन सीओ से हुई जिरह, वीडियो क्रांफ्रेंसिंग से पेश हुए अनुज चौधरी
संभल/चंदौसी। संभल में विवादित धार्मिक स्थल हरिहर मंदिर- शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान 24 नवंबर 2024 को भड़की हिंसा में मारे गए चार युवकों की हत्या मामले में शनिवार को तत्कालीन संभल सीओ और वर्तमान में फिरोजाबाद ग्रामीण एएसपी अनुज चौधरी की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला न्यायालय में गवाही हुई। सुनवाई जिला जज डॉ. विदुषी सिंह की अदालत में हुई।
हिंसा के दौरान चार लोगों की गोली मारकर हत्या करने का आरोप दुबई में बैठे अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टर सारिक साठा के गुर्गे मुल्ला अफरोज और गुलाम पर है। इन दोनों के खिलाफ दर्ज हत्या के इस मामले में शनिवार को सुनवाई के दौरान करीब दो घंटे तक जिरह चली। सुबह 11 बजे से दोपहर एक बजे तक चली सुनवाई में वादी पक्ष की ओर से एएसपी अनुज चौधरी से लगभग 150 सवाल पूछे गए। इस दौरान पुलिसकर्मियों के पास मौजूद हथियारों, एके-47 में इस्तेमाल होने वाली गोलियों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े कई तकनीकी सवाल किए गए।
जिला शासकीय अधिवक्ता राहुल दीक्षित ने बताया कि विपक्षी अधिवक्ता की ओर से अनुज चौधरी को तकनीकी सवालों में उलझाने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने घटना से जुड़े सभी सवालों के तथ्यपरक जवाब दिए। उन्होंने बताया कि अनुज चौधरी ने अदालत को बताया कि उनके पास 9 एमएम की पिस्टल थी, जबकि उनके हमराह पुलिसकर्मियों के पास एके-47 और पंप गन थीं। उन्होंने यह भी बताया कि एके-47 में 7.62x39 एमएम की गोली इस्तेमाल होती है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार जिरह के दौरान कुछ ऐसे सवाल भी पूछे गए जो केस से संबंधित नहीं थे। इस पर अभियोजन ने आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद जिला जज डॉ. विदुषी सिंह ने अधिवक्ता को केवल मामले से जुड़े सवाल पूछने के निर्देश दिए। सुनवाई के दौरान पुलिस फायरिंग को लेकर भी सवाल पूछे गए। इस पर अनुज चौधरी ने अदालत में कहा कि पुलिस की ओर से कोई फायरिंग नहीं की गई थी। केवल पंप गन और रबर बुलेट का इस्तेमाल किया गया था।
वहीं अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ता मोहम्मद आसिफ अख्तर ने दावा किया कि चारों लोगों की मौत पुलिस फायरिंग में हुई थी, न कि जनता की आपसी फायरिंग में। उन्होंने कहा कि शुरुआती पुलिस एफआईआर में यह उल्लेख नहीं था कि मौतें पब्लिक फायरिंग में हुई थीं। अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि बाद में मामले को मजबूत करने के लिए मृतकों के परिजनों की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गईं। अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर संख्या 334, 335, 336 और 337 में कहीं भी यह नहीं लिखा गया कि मौतें जनता की आपसी फायरिंग में हुई थीं। उन्होंने बताया कि उनकी ओर से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे गए और लगभग दो घंटे तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जिरह चली। इस दौरान जिला न्यायालय के बाहर सुरक्षा के कड़े प्रबंध रहे।
