जालौन : रेगिस्तान बनने की कगार पर यूपी का ये जिला, भूजल के बेलगाम दोहन से हालात चिंताजनक
जालौन। बुंदेलखंड के जालौन जिले में भूजल के गिरते स्तर के बीच पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा, अनियंत्रित भूजल दोहन और कम होती वर्षा ने स्थिति को चिंताजनक बना दिया है। कभी बेहतर जल प्रबंधन के लिए पहचान रखने वाला जालौन आज पेयजल और सिंचाई संकट से जूझ रहा है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में नहरों के अंतिम छोर तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है, जिसके चलते किसान सिंचाई के लिए निजी नलकूपों और सबमर्सिबल पंपों पर निर्भर हो गए हैं।
लगातार भूजल दोहन से जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। वहीं धान और मेंथा जैसी अधिक पानी खपत वाली फसलों की खेती को बढ़ावा मिलने से संकट और गहरा गया है। ग्राम पंचायतों में मौजूद तालाब, पोखर और अन्य पारंपरिक जल स्रोत अतिक्रमण और उपेक्षा का शिकार हो चुके हैं। कई तालाब वर्षों से सफाई के अभाव में बदहाल पड़े हैं। इसके कारण वर्षा का पानी जमीन में समाने के बजाय बहकर नष्ट हो जाता है।
वनों की कटाई और मिट्टी के कटाव ने भी जल पुनर्भरण की प्रक्रिया को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार बुंदेलखंड की पथरीली और कठोर चट्टानी भौगोलिक संरचना भी जल संकट का बड़ा कारण है। बारिश का पानी तेजी से बह जाता है और भूजल स्तर को पर्याप्त रीचार्ज नहीं कर पाता। पिछले कुछ वर्षों में मानसून की अनिश्चितता, कम वर्षा और सूखे जैसी परिस्थितियों ने हालात और गंभीर कर दिए हैं।
जालौन का गोपालपुरा गांव कभी अपनी अनोखी जल प्रणाली के लिए प्रसिद्ध था। यहां मौजूद आर्टिजन वेल, जिन्हें स्थानीय भाषा में "पातालतोड़ कुएं" कहा जाता था, प्राकृतिक दबाव से बिना मोटर के 24 घंटे पानी उगलते रहते थे। यही पानी किसानों की सिंचाई का प्रमुख साधन था। पर्याप्त सिंचाई सुविधा होने के कारण यहां बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती होती थी और यहां की उपज दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचती थी, लेकिन अब ये पातालतोड़ कुएं विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
अंधाधुंध बोरिंग, अत्यधिक भूजल दोहन, बारिश की कमी और रखरखाव के अभाव ने इन प्राकृतिक जल स्रोतों को लगभग समाप्त कर दिया है। कई कुएं मलबे और कचरे से पट चुके हैं। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ा है और अनेक किसान सब्जी की खेती छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। गर्मी बढ़ने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट भी गहराने लगा है। कई गांवों में महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जालौन के कई हिस्से भविष्य में रेगिस्तान जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं।
हालांकि इस गंभीर संकट के बीच परमार्थ समाज सेवी संस्था की पहल उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है। रामपुरा ब्लॉक में संस्था द्वारा गठित "जल सहेलियां" जल संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। शुरुआती सामाजिक चुनौतियों के बावजूद महिलाओं ने तालाबों के संरक्षण, चेकडैमों के पुनर्जीवन और जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
संस्था के सचिव संजय सिंह ने बताया कि जल सहेलियों के प्रयासों से बुंदेलखंड के करीब 100 गांवों में जल व्यवस्था में सुधार हुआ है। पिछले पांच वर्षों में चयनित गांवों के तालाबों और चेकडैमों को वैज्ञानिक तरीके से दुरुस्त कराया गया, जिससे लंबे समय तक पानी संरक्षित रखा जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि खेत तालाब निर्माण, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा, अवैध बोरिंग पर रोक, मनरेगा के माध्यम से तालाबों और पातालतोड़ कुओं की सफाई तथा व्यापक जनजागरूकता अभियान ही इस संकट का स्थायी समाधान हो सकते हैं। प्रशासन, समाज और किसानों के संयुक्त प्रयासों से जालौन में जल संरक्षण की पुरानी परंपरा को फिर से जीवित किया जा सकता है।
