सामयिकी : बंगाल की खाड़ी में वर्चस्व चाहता है अमेरिका
बंगाल की खाड़ी में स्थित सेंट मार्टिन द्वीप पर सैन्य अड्डा बनाने का अमेरिकी ख्वाब पूरा हो सकता है। इसी द्वीप पर सैन्य अड्डा बनाने के अमेरिकी प्रस्ताव को ठुकराने की कीमत बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना को सत्ता गवांकर चुकानी पड़ी थी। अब प्रधानमंत्री तारिक रहमान पूरी तरह से अमेरिकी दबाव में हैं और अमेरिका की हर उस बात को मानने को लालायित दिख रहे हैं, जो उनके पड़ोसी देशों के हित में भी नहीं हैं।
अमेरिका और बांग्लादेश के बीच एक रक्षा समझौता होने जा रहा है, जो न सिर्फ भारत की टेंशन बढ़ाएगा, बल्कि दशकों से शांत चल रही बंगाल की खाड़ी में अमेरिका-चीन जैसी महाशक्तियों के बीच वर्चस्व कायम करने को लेकर जंग का अखाड़ा भी बन सकता है। इस समझौते के बाद न सिर्फ अमेरिकी सेना बांग्लादेश के एयरबेस और बंदरगाहों का उपयोग कर सकेगी बल्कि वह यहां से ईरान, चीन, रूस, भारत आदि देशों पर खुफिया नजर भी रख सकेगी।
पिछले दिनों अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल ने बांग्लादेश का दौरा किया था। इस दौरे पर पूर्व में हुए पारस्परिक व्यापार समझौते के क्रियान्वयन के लिए जरूरी शर्तों पर चर्चा हुई थी। साथ ही इस दौरान अमेरिका से बांग्लादेश को भविष्य में मिलने वाली आर्थिक रियायतों के बदले में कुछ मांग भी रखी गई। अमेरिका चाहता है कि बांग्लादेश उसके साथ सैन्य सूचना की सामान्य सुरक्षा समझौता और अधिग्रहण व क्रॉस-सर्विसिंग समझौता करे। इस समझौते के बाद अमेरिका के लड़ाकू विमान बांग्लादेश के हवाई अड्डों और युद्धपोत बंदरगाहों का उपयोग रखरखाव, ईंधन भरने और री-सप्लाई के लिए कर सकेंगे।
अमेरिका इस समझौते के लिए उतावला है। बांग्लादेश के हुक्मरान भी उसे मना नहीं कर सकेंगे। जल्द ही यह समझौता हो जाएगा। इसके बाद तो बांग्लादेश और अमेरिका एक दूसरे को खुफिया सूचनाएं भी देंगे। साथ ही बंगाल की खाड़ी, हिंद महासगर में अमेरिका चीन, भारत आदि देशों की गतिविधियों पर भी नजर रख सकेगा। चटगांव और मातारबारी जैसे रणनीतिक बंदरगाह पर भी उसकी पहुंच हो जाएगी, जो भारत के लिए किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होगा।
इस कदम से न सिर्फ चीन की मलक्का जलडमरूमध्य को बाईपास करने की रणनीति कमजोर होगी, बल्कि चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा व क्यौकफ्यू बंदरगाह तक जाने वाली तेल पाइपलाइनों में चीनी निवेश पर जबरदस्त असर पड़ेगा। अमेरिका बांग्लादेश के बंदरगाहों का न सिर्फ रखरखाव करेगा, बल्कि बड़े पैमाने पर उसे जरूरी हथियार भी उपलब्ध कराएगा। अभी बांग्लादेश की जरूरत का 70 फीसद रक्षा उत्पाद चीन से ही आता है। बांग्लादेश की धरती से चीन, रूस, ईरान, भारत आदि देशों पर निगाह रखने की अमेरिकी की मंशा वर्षों से रही है।
शेख हसीना के सत्ता में रहते उसका यह सपना कभी पूरा नहीं हुआ, क्योंकि शेख हसीना का झुकाव भारत की तरफ तो था ही वह अपनी धरती का उपयोग पड़ोसियों के खिलाफ भी नहीं होने देना चाहतीं थीं, इसलिए अमेरिकी दबाव में वह कभी नहीं आईं और अपनी स्वतंत्र विदेशी नीति के दम पर मजबूती से टिकी रहीं, लेकिन 2024 में हुए आंदोलन के कारण उन्हें न सिर्फ सत्ता से बेदखल होना पड़ा बल्कि जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी।
इस घटनाक्रम के पीछे उन्होंने अमेरिकी हाथ होने का आरोप भी लगाया था। उनके बाद बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार बने मोहम्मद युनूस ने न सिर्फ अमेरिकी हितों को वहां बढ़ावा दिया, बल्कि पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई को भी वहां मजबूती से पांव पसारने का अवसर मिला। अब तो वहां कट्टरपंथी ताकतें भी हावी हो गईं हैं। आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय तो थीं अब अमेरिका से होने जा रहा समझौता भी भारत के लिए बहुत उचित नहीं है।
