Uttrakhand: प्रदेश में गूंजा था नारा...'खंडूरी है जरूरी', सख्त प्रशासन नीति के बाद भी बने दिलों के सरताज
हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड की सियासत में तकरीबन 20 साल पीछे जाएं तो धुंधले पड़ चुके नारों की गूंज आपको यादाश्त को एक बार फिर ताजा कर देगी। उस जमाने में भाजपा खंडूरी की साफ छवि को लोगों के बीच लेकर गई। नारा दिया गया खंडूरी है जरूरी। भले ये नारा भाजपा की प्रचार नीति का हिस्सा रहा हो मगर इसकी शौहरत ने खंडूरी के राजनीतिक कद को भी और बढ़ा दिया।
सूरमाओं की धमक के बीच खिलाया कमल
साल 2000 जब देश में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तरांचल ( अब उत्तराखंड) नाम का एक नया राज्य जन्म ले चुका था। यूपी की राजनीति में बड़ा मुकाम रखने वाले एनडी तिवारी प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। इन सियासी सूरमाओं की धमक के बीच सेना की सेवा के बाद राजनीति में कूदे खंडूरी उत्तराखंड गठन के महज सात साल बाद प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना महज एक सियासी उलटफेर नहीं था। बल्कि आम-जन के मन तक पहुंचने की इबारत बेहद बारीकि से गढ़ी गई थी। यही वजह रही कि सियासी सूरमाओं की धमक के बीच भी उन्होंने प्रदेश में कमल खिला दिया।
उत्तराखंड का भरोसेमंद चेहरा बने
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद खंडूरी भाजपा के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल हो गए। साल 2007 में जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सत्ता को सिर्फ राजनीतिक ताकत नहीं, बल्कि जवाबदेही का माध्यम बनाया। उनके कार्यकाल में “खंडूरी है जरूरी” नारा केवल चुनावी जुमला नहीं रहा, बल्कि जनता के बीच उनकी ईमानदार छवि का प्रतीक बन गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सख्ती ने कई नेताओं और अफसरों को असहज किया, लेकिन जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती गई।
पहाड़ की राजनीति का एक अध्याय खत्म
उत्तराखंड की राजनीति के एक सख्त, ईमानदार और अनुशासनप्रिय चेहरे का अंत हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के निधन के साथ ही पहाड़ की राजनीति का वह अध्याय भी लगभग समाप्त हो गया, जिसकी पहचान सुशासन, सादगी और प्रशासनिक सख्ती से होती थी। लंबे समय से बीमार चल रहे खंडूरी ने देहरादून के मैक्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर के बाद उत्तराखंड ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी शोक की लहर दौड़ गई।
अटल ने पहचानी राजनीतिक क्षमता
भारतीय सेना से राजनीति तक का उनका सफर किसी साधारण नेता की कहानी नहीं, बल्कि अनुशासन और राष्ट्रसेवा की मिसाल रहा। सेना में मेजर जनरल के पद तक पहुंचने वाले खंडूरी को सक्रिय राजनीति में लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाता है। वाजपेयी ने उनकी प्रशासनिक क्षमता और साफ छवि को पहचानते हुए उन्हें भारतीय जनता पार्टी में बड़ी जिम्मेदारियां सौंपीं। यही वह दौर था जब खंडूरी राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से उभरे और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
सत्ता से ज्यादा प्यारा था सिद्धांत
राजनीतिक तौर पर खंडूरी उस पीढ़ी के नेता थे, जिनके लिए सत्ता से ज्यादा महत्व सिद्धांतों का था। सड़क, कनेक्टिविटी और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास को उन्होंने प्राथमिकता दी। भूमि कानूनों को लेकर उनका रुख बेहद सख्त रहा। उनका मानना था कि उत्तराखंड की जमीन और संसाधनों की रक्षा राज्य की अस्मिता से जुड़ा विषय है। यही वजह रही कि उन्होंने बाहरी हस्तक्षेप और अवैध कब्जों के खिलाफ कठोर कदम उठाए।
कठोर प्रशासन से जीता भरोसा
भुवन चंद्र खंडूड़ी का राजनीतिक जीवन इस बात का उदाहरण रहेगा कि सादगी और कठोर प्रशासन भी जनता का भरोसा जीत सकता है। आज जब राजनीति पर अवसरवाद के आरोप लगते हैं, तब खंडूरी जैसे नेताओं की कमी और अधिक महसूस होती है। उनका जाना केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री का निधन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सियासत से एक अनुशासित और सिद्धांतवादी युग का विदा होना है।
