संपादकीय: गरमी से राहत कैसे
बरेली हो या बांदा पूरा उत्तर भारत इन दिनों भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। सूबे के दर्जन से ज्यादा जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। हल्द्वानी जैसे पहाड़ी इलाकों का तापमान भी 40 डिग्री को छूने वाला है। मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों के लिए 'येलो' और उसके बाद 'ऑरेंज' अलर्ट जारी कर दिया। सरकार ने 12वीं तक की कक्षाएं स्थगित कर दीं, प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारियों को घर से काम करने को कहने, सड़कों पर जल छिड़काव करवाने एवं प्राणि उद्यानों में वन्य जीवों को गरमी से बचाने के लिए प्रबंध करने के अलावा लोगों को यह हिदायत दी कि लोग दोपहर से शाम तक घर से बाहर न निकलें।
हर साल गरमी से बचाव के उपायों में ये सब शामिल होता है। साल दर साल गरमी की तीव्रता बढ़ती जा रही है और आगे और बढ़ेगी। प्रकृति प्रसूत इस प्रकोप का सीधा और मुकम्मल इलाज हमारे पास नहीं, पर जब यह कोई आकस्मिक, परिघटना नहीं है, पता है कि भारत के इस हिस्से में एक तय समय के दौरान भीषण गरमी पड़ती है, तो इससे निबटने, इसे सह्य बनाने के सफल प्रयास अब तक क्यों नहीं किए जा सके। गरमी आने पर उससे निबटने के फौरी प्रयास प्यास लगने पर कुआं खोदने जैसे लगते हैं और ये प्रयास भी स्थाई नहीं होते, बल्कि अगली साल की गर्मियों में दोहराने पड़ते हैं।
निःसंदेह हम गरमी के मूल कारकों को नहीं रोक सकते, लेकिन जब हम हर क्षेत्र में विकास कर लोगों का जीवन सुगम बनाने का दावा कर सकते हैं, तो इस भीषण गरमी से निबटने, जनता, मवेशियों, खेती को उससे बचाने और सहने लायक बनाने के स्थायी प्रयास क्यों नहीं कर सकते। आज इंटरनेट के युग में आम लोग भी यह जानते हैं कि सिंगापूर से लेकर सियरा लियोन, एथेंस और बांग्लादेश से लेकर ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे देशों ने डीआई यानी थर्मल डिस्कम्फर्ट इंडेक्स का एटलस बनाने, चीफ हीट ऑफीसर नियुक्त करने और उन ऑफीसर्स द्वारा इससे निबटने के लिए क्या-क्या किया गया और उन्हें कितनी सफलता मिली।
हमारे यहां हीट एक्शन प्लान है पर वह भी लखनऊ, प्रयागराज, झांसी आगरा जैसे उच्च जोखिम वाले तमाम जिलों में पर्याप्त कुशलता से लागू नहीं। मौसम विभाग की ‘हीट इंडेक्स’ प्रणाली अभी भी चरणबद्ध विस्तार में है। कई छोटे शहरों में तकनीकी रूप से तो गरमी का डेटा उपलब्ध है, पर सार्वजनिक बुलेटिन ही रोजाना जारी नहीं होता। शहरों के कुछ इलाकों में अत्यधिक गरमी वाले क्षेत्र ‘हीट आइलैंड’ बन जाते हैं, इन्हें पहचानने और इलाकों की हीट प्रोफाइल तैयार करने का भी व्यापक काम अभी तक नहीं हुआ है, जो इस मर्ज की अकसीर दवा बन सकती है। भवन और अवसंरचना निर्माण के लिए कूल मेटेरियल पर कारगर शोध की बात हो या शहरों में इलाके, बाजार पहचान कर शेड की व्यवस्था, कूल रूफ, कूलिंग सेंटर बनाना, मजदूर, गिग वर्कर्स, इत्यादि के लिए संबंधित योजनाओं का नितांत अभाव है। उम्मीद है कि सरकार ने हर साल आने वाली भीषण गरमी से निबटने के अस्थाई उपायों के साथ स्थाई प्रबंधों पर भी बढ़ेगी।
