रुपया कमजोर होना गंभीर संकेत
भारतीय रुपया हाल ही में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने सर्वकालिक निचले स्तर (96 प्रति डॉलर के पार) पहुंच गया। इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ एक आम आदमी की जेब पर भी पड़ता है।
भारतीय रुपया हाल ही में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने सर्वकालिक निचले स्तर (96 प्रति डॉलर के पार) पहुंच गया है, जो एक नया रिकॉर्ड निचला स्तर है। फरवरी के अंत में ईरान-अमेरिका संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपये में डॉलर के मुकाबले लगभग 5.2% की गिरावट आई है। ये भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है। भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने आयात महंगा कर दिया है, जिससे घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति और आम जनता के बजट पर भारी दबाव पड़ रहा है।
गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने मंगलवार को भी चालू वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत से घटकर 6.7 रहने का अनुमान जताते हुए कहा है कि मांग और आपूर्ति दोनों में सुस्ती और वैश्विक अनिश्चितताएं इसकी प्रमुख वजह होंगी। राहत की बात ये है कि इंडिया रेटिंग्स ने कहा है कि ईंधन कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के बावजूद खुदरा मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत रह सकती है, जो कि आरबीआई के लक्षित दायरे के भीतर ही है।
दुनिया के बाजार में डॉलर एक ऐसी करेंसी है, जिससे ज्यादातर व्यापार होता है। अगर डॉलर की मांग बढ़ जाए या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ें, तो रुपये की वैल्यू कम होने लगती है। जब हमें एक डॉलर खरीदने के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा रुपये देने पड़ते हैं, तो हम कहते हैं कि रुपया कमजोर हो गया है। रुपये की कमजोरी केवल एक मुद्रा का अवमूल्यन नहीं है, बल्कि यह व्यापक आर्थिक दबावों का दर्पण है। ग्लोबल मार्केट में जब भी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ एक आम आदमी की जेब पर भी पड़ता है।
खबर आती है कि डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर गिरा, तो बहुत से लोग इसे सिर्फ शेयर बाजार या बड़े कारोबारियों से जुड़ी खबर मानकर छोड़ देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि रुपये की सेहत का सीधा असर आपकी रसोई, बच्चों की पढ़ाई और जेब पर पड़ता है। यही नहीं विदेश यात्रा करना, विदेशों में शिक्षा प्राप्त करना या विदेशी सॉफ्टवेयर व सेवाएं इस्तेमाल करना भारतीय नागरिकों के लिए अधिक महंगा हो जाता है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80-85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। मध्य पूर्व के तनाव ने तेल की कीमतों और आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। अब अगर रुपया कमजोर होगा, तो तेल कंपनियों को तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे। जब तेल महंगा होगा, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे। ऐसे में साफ है कि डीजल महंगा होने का मतलब है, माल ढुलाई महंगी होना। इससे सब्जी, फल और अनाज से लेकर हर छोटी-बड़ी चीज की कीमतें बढ़ जाएंगी।
आज भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। वर्ष 2025 वह समय था, जब केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप में तेजी से वृद्धि हुई थी, जिससे रुपये का ‘कृत्रिम स्थिरीकरण’ हुआ था, हालांकि मुद्रा को एक निश्चित स्तर पर बनाए रखने के लिए किए गए बाजार हस्तक्षेप अर्थव्यवस्था में अंतर्निहित असंतुलन को ठीक करने के लिए आवश्यक समायोजन में देरी कर सकते हैं, लेकिन रुपये की समस्याएं कहीं अधिक गंभीर हैं।
मुद्रा की कमजोरी ऐसे समय में आई है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अच्छी गति से विकास कर रही है, मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटा दोनों ही कम हैं। वर्ष 2025 में, जब डॉलर सूचकांक 109 से गिरकर 98 पर आ गया, तो रुपया डॉलर के मुकाबले 4.7 प्रतिशत गिर गया। ये समस्याएं पूंजी और चालू खातों दोनों पर दबाव के कारण उत्पन्न हुई हैं। देश से पूंजी का प्रवाह बाहर हो रहा है और विदेशी और घरेलू निवेशक वैकल्पिक निवेश विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।
निवेशक पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की संभावनाओं को लेकर अधिक उत्साहित दिख रहे हैं। चालू खाते की बात करें तो, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि दबाव डाल रही है, जिससे वित्तपोषण चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
यही वजह है कि बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश वासियों से पेट्रोल-डीजल का कम उपयोग करने, सार्वजनिक वाहन का प्रयोग करने, कुछ समय के लिए विदेश यात्रा न करने और सोना न खरीदने की अपील की। एक सप्ताह के भीतर ही पेट्रोल के दाम दो बार बढ़ाए गए। हालात ये हैं कि वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश (जैसे डॉलर) की ओर भाग रहे हैं।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डॉलर लगातार हावी बना हुआ है, जिससे रुपया अन्य एशियाई मुद्राओं के साथ दबाव में है। कहना गलत न होगा कि अगर यही हालात बने रहे तो बढ़ती मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बनेगा, जिससे आम जनता के लोन की ईएमआई बढ़ सकती है, हालांकि आरबीआई लगातार बाजार में हस्तक्षेप करके अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपये को स्थिर करने का प्रयास कर रहा है।
भारत जैसे तरक्की कर रहे देश की मुद्रा में थोड़ी-बहुत गिरावट आना नॉर्मल है। हमारी अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है। खपत बढ़ रही है। निर्यात की तुलना में आयात अभी भी अधिक है। इससे समय के साथ रुपये पर दबाव बनना स्वाभाविक है। अगर आप डॉलर में खर्च करते हैं, तो जरूर इससे आपकी मुश्किल बढ़ेगी। अगर आप अपने बच्चे को मास्टर्स डिग्री के लिए अमेरिका भेजने की सोच रहे हैं, तो पिछले साल बनाया गया बजट अचानक कम लगने लगेगा, क्योंकि रुपये को डॉलर में बदलकर आपको खर्च करना होगा। यानी जिस व्यक्ति को विदेशी मुद्रा में खर्च करना पड़ता है, उसके लिए रुपये का कमजोर होना अच्छी खबर नहीं है।
वर्तमान में जो हालात हैं, उसमें देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए वैकल्पिक और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को तेजी से अपनाना होगा। फार्मा, इंजीनियरिंग और आईटी जैसे क्षेत्रों के निर्यात को प्रोत्साहित करके व्यापार घाटे को कम करना एक स्थायी समाधान है। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
अनुमान चेतावनी देते हैं कि यदि मुद्रा का मूल्य 95-96 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर से नीचे बना रहता है, तो भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक लक्ष्य को प्राप्त करने की समयसीमा वित्त वर्ष 2030 तक टल सकती है। यदि रुपये की गिरावट को रोकने के लिए त्वरित और दूरगामी कदम नहीं उठाए गए, तो यह देश के आर्थिक विकास और आम आदमी की क्रय शक्ति को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
केंद्रीय बैंक ने अतीत में कई बार बाजारों में हस्तक्षेप किया है, हालांकि दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि मुद्रा को स्वतंत्र रूप से चलने दिया जाए। रुपये को एक शॉक एब्जॉर्बर के रूप में काम करना चाहिए। वर्तमान समय में, अर्थव्यवस्था की समस्याओं को दूर करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। विदेशी पूंजी आकर्षित करने, घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और माल निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है। विकास में संरचनात्मक बाधाओं को तत्काल दूर करने की आवश्यकता है।
