परीक्षा-प्रणाली और युवाओं की मनःस्थिति
कभी प्रश्नपत्र लीक होने की खबरें सामने आती हैं, कभी परीक्षा रद्द करनी पड़ती है, कभी परिणामों को लेकर असंतोष दिखाई देता है, तो कभी मूल्यांकन प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ जाती है।
भारत में परीक्षा केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं होती। करोड़ों परिवारों के लिए यह अवसरों तक पहुंच का सबसे बड़ा माध्यम होती है। एक परीक्षा किसी विद्यार्थी का कॉलेज तय करती है, दूसरी उसका पेशा। एक रैंक किसी प्रतिष्ठित संस्थान का दरवाज़ा खोल सकती है, तो कुछ अंकों की कमी कई वर्षों की मेहनत को पीछे धकेल सकती है। ऐसे में परीक्षा-प्रणाली को लेकर पैदा होने वाला हर संदेह सीधे विद्यार्थियों और उनके परिवारों तक पहुंचता है।
देश में आज कभी प्रश्नपत्र लीक होने की खबरें सामने आती हैं, कभी परीक्षा रद्द करनी पड़ती है, कभी परिणामों को लेकर असंतोष दिखाई देता है, तो कभी मूल्यांकन प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ जाती है। तकनीकी व्यवस्थाएं भी बहस का विषय बनी हैं। अलग-अलग परीक्षाओं में कारण अलग रहे हैं।
चाहे बात नीट-यूजी की हो या सीबीएसई की हो, विवादों के कारण अलग रहे, लेकिन चिंताएं लगभग एक जैसी रहीं। एक ओर परीक्षा-सुरक्षा पर सवाल उठे, दूसरी ओर मूल्यांकन प्रक्रिया पर। तकनीकी व्यवस्थाओं को लेकर बहस हुई और निर्णय लेने की पारदर्शिता पर। कहा गया कि समस्या अस्थायी है और आवश्यक सुधार किए जा रहे हैं, लेकिन जब बड़े परीक्षा-चक्र के बाद किसी न किसी रूप में वही सवाल लौट आएं, तो लोगों का ध्यान किसी एक घटना से हटकर पूरी व्यवस्था की तरफ जाने लगता है।
ये विवाद परीक्षा-प्रणाली के दो सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों से जुड़े दिखाई देते हैं-परीक्षा और परिणाम। यदि परीक्षा की सुरक्षा पर संदेह हो तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं। यदि मूल्यांकन, रिकॉर्डिंग या तकनीकी प्रक्रिया पर सवाल हों तो परिणामों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और जब परीक्षा तथा परिणाम, दोनों ही बहस का विषय बनने लगें, तो असर किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव पूरी व्यवस्था की साख पर पड़ता है।
परीक्षा-प्रणाली की विश्वसनीयता केवल परिणामों से तय नहीं होती। उसका आधार यह विश्वास होता है कि प्रक्रिया निष्पक्ष है और परिणाम वास्तविक प्रदर्शन को दर्ज करते हैं। विद्यार्थी परीक्षा देते समय यह मानकर चलते हैं कि उनकी मेहनत का सही मूल्यांकन होगा। अभिभावकों को भरोसा होता है कि प्रक्रिया समान अवसर देगी। समाज भी परिणामों को, इसलिए स्वीकार करता है, क्योंकि उसके पीछे योग्यता-आधारित चयन की धारणा होती है, लेकिन जब प्रक्रिया ही लगातार सवालों के घेरे में आने लगे, तो यह विश्वास धीरे-धीरे प्रभावित होने लगता है।
यही कारण है कि अब कई विद्यार्थियों की चिंता केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहती। उनके सामने यह प्रश्न भी रहता है कि रिकॉर्ड सही तरीके से दर्ज हुआ या नहीं, मूल्यांकन ठीक से हुआ या नहीं, तकनीकी प्रक्रिया में कहीं कोई त्रुटि तो नहीं हुई और परिणाम वास्तव में उनके प्रदर्शन को ही दर्ज करेंगे या नहीं। पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा को लेकर विद्यार्थियों की मनःस्थिति में आया यह बदलाव अपने-आप में एक महत्वपूर्ण संकेत है।
पिछले एक दशक में परीक्षा-प्रक्रियाओं में तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। डिजिटल मूल्यांकन, ऑनलाइन निगरानी, केंद्रीकृत डेटा-प्रबंधन और नई तकनीकी प्रणालियों को अधिक पारदर्शी और तेज व्यवस्था का आधार बताया गया। विशाल छात्र संख्या और व्यापक परीक्षा-तंत्र को देखते हुए इसकी आवश्यकता भी थी, लेकिन किसी भी तकनीकी व्यवस्था की उपयोगिता अंततः उसके संचालन और विश्वसनीयता से तय होती है। यदि किसी नई प्रणाली के लागू होने के बाद उसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगें, तो चर्चा केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहती।
तब प्रश्न तैयारी, परीक्षण, निगरानी और प्रशासनिक फैसलों की गुणवत्ता तक पहुंचता है। यह भी पूछा जाने लगता है कि जिन व्यवस्थाओं का सीधा संबंध विद्यार्थियों के परिणामों से है, क्या उन्हें लागू करने से पहले पर्याप्त स्तर पर परखा गया था, क्योंकि तकनीकी गड़बड़ियां केवल किसी सॉफ्टवेयर या प्लेटफ़ॉर्म की समस्या नहीं रह जातीं, उनका असर सीधे मूल्यांकन और परिणामों पर दिखाई देता है।
इसी तरह परीक्षा-सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यदि किसी परीक्षा को सुरक्षित बनाने के लिए बार-बार अतिरिक्त निगरानी, विशेष सुरक्षा-व्यवस्थाओं और असाधारण नियंत्रणों की आवश्यकता महसूस हो, तो ऐसी परिस्थितियां सामान्य संस्थागत व्यवस्थाओं की क्षमता को लेकर भी प्रश्न खड़े करती हैं। किसी भी प्रणाली की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह संकट आने के बाद क्या करती है। उसका आकलन इस आधार पर भी होता है कि वह संकटों को रोकने में कितनी सक्षम है।
इन सबके बीच सबसे अधिक दबाव विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ता है। देश में पहले ही प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा है। लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं। परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग, किताबों, आवास और दूसरे शैक्षणिक खर्चों पर लगाते हैं। कई घरों में पूरी आर्थिक और सामाजिक योजना किसी एक परीक्षा के परिणाम से जुड़ जाती है। ऐसे में यदि परीक्षा-प्रक्रिया को लेकर ही अनिश्चितता पैदा होने लगे, तो उसका असर केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता। वह मानसिक दबाव, असुरक्षा और निराशा के रूप में भी सामने आता है।
