UP में बाल अधिकार आयोग के पुनर्गठन का रास्ता साफ: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा निर्देश, निष्क्रिय पड़े पदों पर जल्द होंगी नियुक्तियां

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाली शीर्ष संस्था 'राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग' (UPSCPCR) को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। अदालत ने आयोग में लंबे समय से खाली चल रहे अध्यक्ष और सदस्यों के पदों पर गहरी चिंता जताते हुए प्रदेश सरकार को आगामी चार महीनों के भीतर सभी नियुक्तियां अनिवार्य रूप से पूरी करने का आदेश दिया है।

'ह्यूमन यूनिटी मूवमेंट' की याचिका पर आया फैसला

यह सख्त निर्देश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की डिवीज़न बेंच ने 'ह्यूमन यूनिटी मूवमेंट' नामक संस्था द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL संख्या 537/2026) पर सुनवाई करते हुए जारी किया।

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि इस वैधानिक संस्था का कार्यकाल 16 नवंबर 2024 को ही समाप्त हो चुका है। तब से लेकर अब तक रिक्तियों के न भरे जाने के कारण आयोग पूरी तरह से ठप पड़ा है। संस्था के वकीलों दुर्गेश कुमार शुक्ला और कुमारी विश्व मोहिनी ने कोर्ट को बताया कि बाल श्रम उन्मूलन, मानव तस्करी पर रोक, पॉक्सो (POCSO) एक्ट की निगरानी और शिक्षा के अधिकार (RTE) जैसे संवेदनशील व जरूरी मामलों को देखने वाला यह मुख्य निकाय है, जिसका निष्क्रिय रहना ठीक नहीं है।

कोर्ट ने जताई जल्द बहाली की उम्मीद

मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को इस प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता देने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपेक्षा जताई है कि आदेश जारी होने की तारीख से 120 दिनों (चार महीने) के भीतर आयोग के पुनर्गठन का काम पूरा कर लिया जाए। इस ऐतिहासिक निर्देश के साथ ही अदालत ने जनहित याचिका को अंतिम रूप से निस्तारित कर दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से उत्तर प्रदेश के करोड़ों बच्चों के कल्याण और उनकी सुरक्षा से जुड़े कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलेगी।

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