भाजपा में घटेगी महामंत्रियों और उपाध्यक्षों की संख्या, यूपी में 2027 चुनाव से पहले प्रदेश इकाई को नया स्वरूप देने पर मंथन
क्षेत्रीय संतुलन और चुनावी जरूरतों के हिसाब से तय होगा नया संगठन
लखनऊ, अमृत विचार: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा अपने संगठनात्मक ढांचे को नया स्वरूप देने की तैयारी में जुट गई है। प्रदेश अध्यक्ष के चयन के बाद अब नई प्रदेश कार्यकारिणी के गठन को लेकर मंथन तेज हो गया है। इसबार महामंत्रियों और उपाध्यक्षों की संख्या कम हो सकती है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस बार संगठन में पदाधिकारियों की संख्या और जिम्मेदारियों में बदलाव देखने को मिल सकता है। राष्ट्रीय नेतृत्व की मंशा प्रदेश इकाइयों को अपेक्षाकृत छोटा और अधिक प्रभावी बनाने की है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश भाजपा में भी महामंत्रियों और उपाध्यक्षों की संख्या कम करने का प्रस्ताव चर्चा में है। फिलहाल सात महामंत्रियों की जगह छह महामंत्री रखने और 18 उपाध्यक्षों की संख्या घटाने पर विचार चल रहा है। हालांकि अंतिम फैसला संगठनात्मक और चुनावी जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
प्रदेश भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की है। पश्चिम, ब्रज, अवध, कानपुर-बुंदेलखंड, काशी और गोरखपुर क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने के साथ-साथ जातीय और सामाजिक समीकरण भी साधने होंगे। यही वजह है कि संगठन का आकार कम करने के प्रस्ताव पर अभी अंतिम सहमति नहीं बन सकी है।
पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि 2027 के चुनावी रण से पहले संगठन में कुछ नए चेहरों को मौका दिया जाएगा। खासतौर पर कानपुर-बुंदेलखंड और पश्चिम क्षेत्र से नए पदाधिकारियों की एंट्री की संभावना जताई जा रही है। वहीं काशी क्षेत्र को विशेष महत्व मिलने की संभावना है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण यह भाजपा की रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है।
महामंत्रियों की भूमिका में भी हो सकता है बदलाव
पिछली कार्यकारिणी में महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ला को कार्यालय प्रभारी के साथ गोरखपुर क्षेत्र की जिम्मेदारी भी दी गई थी। इस बार संगठन महामंत्रियों के कार्यविभाजन में बदलाव कर अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारियां नए सिरे से तय कर सकता है।
2027 चुनाव पर टिकी संगठन की नजर
भाजपा नेतृत्व का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को अधिक चुस्त और जवाबदेह बनाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से नई कार्यकारिणी में पदों की संख्या से ज्यादा उनकी उपयोगिता और चुनावी प्रभाव को प्राथमिकता दी जा रही है। संगठनात्मक बदलावों को 2027 के चुनावी अभियान की तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।
