प्रतिशोध कहानी: अहंकार, पश्चाताप और एक खामोश चीख
बृज गोयल, मेरठः बीस साल गुजर गए हैं, लेकिन फिर भी लगता है जैसे आज भी रूपा का भयानक चेहरा कह रहा है- देव, तुमने मुझे कभी सुख नहीं दिया। हमेशा तड़पाया है। याद रखना मरने से पहले मैं तुम्हें एक ऐसा रहस्य बनाऊंगी, जिसे सुनकर तुम जीते जी चैन नहीं पाओगे।
पूरा साल बीत गया। मैं बिस्तर पर पड़ा हूं, कोई पानी देने वाला भी नहीं है। ऐसे में मुझे रूपा की बार-बार याद आती है। आज वह जिंदा होती, तो मेरा सहारा बनती, पर मैंने ही तो मजबूर किया था उसे घुट-घुटकर मरने को। शराब के नशे में उसे पीटता था। कितने जुल्म करता था उस पर। आज उसकी स्मृति ही मेरी आंतरिक पीड़ा को बढ़ाती है।
रूपा मेरी पत्नी थी, पर मैंने उसे कभी पत्नी का अधिकार नहीं दिया। इसका कारण था रूपा अपने नाम के बिल्कुल विपरीत थी। उसे साधारण कहना भी उचित नहीं था। वह बदसूरत थी, उसको देखकर मुझे बड़ी वितृष्णा होती थी। न जाने उसका नाम रूपा क्यों रख दिया था? रूपा सुंदर तो नहीं थी, पर उसने अपने कुशल व्यवहार से सबको अपना बना लिया था। रूपा धनी परिवार से आई थी। धन के ढेर में उसकी बदसूरती छिप जाएगी, शायद पापा ने शादी करते समय यही सोचा होगा, लेकिन मैं एक पल को नहीं भूला कि रूपा बदसूरत है। मुझे उसके घर की धन दौलत से कुछ लेना-देना नहीं था।
बस पहले ही दिन से मैंने रूपा को सताना शुरू कर दिया। कभी उससे बात नहीं करता था। वह स्वयं कुछ पूछती तो भी सीधे जवाब नहीं देता। यह सब मैं उससे अपनी जान छुड़ाने के लिए करता ताकि वह तंग आकर वापस घर चली जाए। वह चुपचाप सब सहती रही। मैं शराब के नशे में रात को देर से घर आता। घर में खाना नहीं खाता। अपने कमरे के अलावा और कहीं नहीं बैठता था। वह मुझे देखते ही मेरे पास आती, मेरे हर आदेश का पालन करती, मेरे कपड़े, जूते उठाकर रखती, चाय बनाकर लाती। पैर दबाती, मैं उसे जर खरीद गुलाम की नजर से देखता, वह अचल शिला सी कभी कोई शिकायत नहीं करती थी। वह हर जुर्म को शांति से बर्दाश्त करती और मैं उसके धैर्य के टूटने की प्रतीक्षा करता रहता।
विवाह को चार साल बीत गए। मैंने उसे पलभर की भी निकटता नहीं दी थी। अब तक तो सह गई पर अब उसे सूनी गोद सताने लगी थी। वह रात-रात जागती रहती थी, उसकी सिसकी में अक्सर सुनता था, पर मैंने कभी रोने का कारण नहीं पूछा। एक रात अचानक रूपा को अपने पैरों में पड़ी देखा तो क्रोध से भड़क गया और आने का कारण पूछा। वह रोने लगी। मुझे और भी गुस्सा आया। मैंने उसे नीचे धकेल दिया। वह जमीन पर पड़ी सिसकती रही, पर मेरा अहम समाप्त नहीं हुआ। मैंने उसे कमरे से बाहर घसीट दिया। तब वह सुबकते हुए बोली, तुम मुझे सजा क्यों दे रहे हो? मेरा गुनाह तो बताओ, जो मैं तुम्हारे सामिप्य से इतनी दूर हूं।
अगले दिन से रूपा निढाल उदास हो गई और बीमार सी दिखने लगी, लेकिन वह रोज रात को डायरी जरूर लिखती थी। मैंने उसकी डायरी पढ़नी चाही, पर मेरे हाथ नहीं लगी। उन्हीं दिनों मैं भी रोगग्रस्त हो गया, तो रूपा ने अपनी परवाह किए बिना मेरी अथक सेवा की। कभी सिर दबाती, कभी दवा पिलाती। रात-रात भर वह मेरे पैर दबाते गुजार देती थी। मैं सब देखता महसूस करता पर अपने अहंकार को नहीं जीत पाया था, जो पुरुषार्थ बना हर समय मुझ पर छाया रहता था, लेकिन जीत रूपा की हुई। सेवा जीत गई। अहंकार हार गया।
शायद नींद में अनजाने ही मैंने उसे पैरों से उठाकर आगोश में समेट लिया था। जब मैं ठीक हो गया, तो डॉक्टर ने कहा- “देव, मैंने तो सिर्फ तुम्हें दवा दी थी, पर ठीक तुम रूपा की सेवा से हुए हो।” तब मैंने देखा, डॉक्टर की बात सुनकर रूपा मुस्करा रही थी। रूपा को सेवा का बहुत मीठा फल मिला। कुछ समय बाद उसने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। वह मां बन गई थी और मेरे दिल में भी बाप का दिल सागर सा हिलोरें मारने लगा था। विधि की कैसी विडंबना थी, जिस रूपा से मैं नफरत करता था, उसी की कोख से जन्मे बच्चे के प्रति मेरे मन में अथाह प्यार उमड़ रहा था। मैं इसलिए भी ज्यादा खुश था कि वह रूपा पर नहीं था। मैं रूपा के सामने उसे कभी नहीं खिलाता था, उसकी निगाह बचाकर ही उसे लेता था। अगर खिलाते समय रूपा देख ले, तो मैं ऐसे काला पड़ जाता जैसे मैं चोरी करते पकड़ा गया हूं।
जब से रूपा मां बनी, वह कमजोर सी हो गई थी, लेकिन मैंने कभी उसकी बीमारी क्या है, जानने की जरूरत नहीं समझी। न ही दवा या डॉक्टर का प्रबंध किया। नादान भोला साहिल जब कुछ बड़ा हुआ, तो मां के प्रति मेरा रवैया देखकर सहम जाता। ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता गया, उसका प्यार मेरे प्रति कम होता गया। वह अपनी मां को बहुत प्यार करता था।
रूपा हमेशा के लिए रोगी हो गई थी। साहिल स्कूल जाने लगा था। वह सारा समय रूपा के पास ही रहता। मेरे पास अब बिल्कुल नहीं आता था। मैं बहुत हैरान था। मैं उससे कुछ कहता तो भी वह मेरी बात पर ध्यान नहीं देता था। मैंने जो अत्याचार रूपा पर किए थे, वह शायद उन सबका बदला ले रहा था। उसकी दुनिया उसका प्यार सिर्फ रूपा तक ही सीमित था। अपने बेटे का अमूल्य प्यार पाकर रूपा को जैसे दुनिया की सारी खुशी मिल गई थी। मैं उस खुशी की सिर्फ कल्पना ही कर सकता था।
मुझे वह दिन याद आ रहा है। जब रूपा ने मुझे श्राप सा दिया था। उस रात मैं सो नहीं सका था। रूपा मुझे कौन सा रहस्य बताएगी? मुझे रूपा से डर लगने लगा था कि तभी साहिल की चीख सुनाई दी। मैं वहां दौड़कर गया, देखा जमीन पर पड़ी रूपा को वह उठा रहा है। मैंने उसे सहारा देना चाहा पर साहिल बोला- रहने दीजिए पापा, मां मुझे भारी नहीं लगेगी। साहिल के शब्द सुनकर मैं स्तब्ध रह गया।
साहिल की आंखों में मेरे प्रति घृणा और तिरस्कार के भाव थे। जैसे वह कह रहा हो, मेरी बदसूरत मां मुझ पर बोझ नहीं है। उसने रूपा को पलंग पर लिटा दिया और होश में लाने का उपचार करने लगा। मैं अपराधी बना खड़ा रहा। कुछ देर बाद रूपा को होश आया, तो मुझ पर नजर पड़ी। लड़खड़ाती आवाज में बोली-“देव-साहिल-तुम्हारा-बेटा-नहीं-है।”
फिर उसने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं। साहिल मां पर गिरकर बिलख पड़ा-मां मुझे किसके सहारे छोड़ जाती हो, लेकिन रूपा की आत्मा आकाश में विलीन हो चुकी थी हमें रोता छोड़कर। तभी साहिल के शब्द पिघले शीशे की तरह कान में पड़े। आप क्यों रो रहे हैं पापा? आपने तो जी भरकर मां पर अत्याचार किए और घुट घुटकर मरने पर मजबूर किया है। आगे मैं सुन नहीं सका और उठकर भागा कि पैर फिसल गया, हड्डी टूट गई। रूपा की अर्थी को कंधा देकर अंतिम विदाई भी न दे सका। शायद सदैव की भांति, अंत में भी रूपा को मेरे सहयोग से वंचित रहना था। रूपा चली गई अपने बेटे का असीम प्यार समेट। मैं रह गया, उसकी घृणा का पात्र बना। साहिल के लिए मैं बेगाना था। वह वीरान सा घंटों मां के सूने पलंग पर बैठा रहता था।
मैं कभी उसे समझाने का प्रयास करता, तभी मेरे मस्तिष्क में धमाका होता था- “देव साहिल तुम्हारा बेटा नहीं है।” मैं पागलों की तरह मुट्ठी भींच लेता और साहिल को ध्यान से देखता-उस अज्ञात प्रतिबंध को खोजता, जो उसका जन्मदाता हो पर असमर्थ रहता। मैंने मन में धारणा बना ली थी कि साहिल मेरा बेटा नहीं है। मैं उस डॉक्टर से साहिल की सीरत मिलाने का यत्न करता, लेकिन सूरत में तो वह मुझ पर गया था। रूपा को गए पांच साल बीत गए थे, साहिल बीए पास कर चुका था, मुझे पक्षाघात की बीमारी हो गई थी। साहिल उखड़ा-उखड़ा सा मेरी देखभाल कर रहा था। मैं भी मन के अंतर्द्वंद में फंसा और उसको पराया खून समझकर पूरा प्यार नहीं दे पाता था। एक दिन वह जाने कहां चला गया और चार शब्द लिखकर रख गया- “पापा मैं जा रहा हूं। मां के बिना यह घर जेल सा प्रतीत होता है, फिर आपका प्यार अधूरा है, जो मुझे बांध नहीं पाया। मां के बिना मैं बहुत अकेला हूं। मुझे क्षमा कर देना।” पत्र पढ़कर मेरी आंखों में अंधेरा छा गया। रूपा का श्राप सच हो रहा था। मैं खिसक-खिसक कर साहिल के कमरे में गया ताकि उसका कुछ पता ठिकाना मिल जाए कि वह कहां जा सकता है पर कोई सुराग नहीं मिला। हां, रूपा की डायरी जरूर मिल गई, जिसे लाख प्रयत्न करने पर भी मैं नहीं पा सका था। मैंने उसे पढ़ा।
वह बेजान डायरी मेरे अत्याचारों की कहानी दोहरा रही थी और वह तारीख रूपा के मरने से एक दिन पहले की थी, जब उसने मुझे श्राप दिया था। लिखा था, देव को एक रहस्य बताने का वादा किया है, जबकि रहस्य कुछ भी नहीं है। बस उसे तड़पाना चाहती हूं, बेचैन करना चाहती हूं, कसक और घुटन का अहसास दिलाना चाहती हूं, बस कह दुंगी –“साहिल तुम्हारा बेटा नहीं है?”
यह पढ़ते ही मैं कांप गया... मेरा सिर चकरा गया। डायरी मेरे हाथ से गिर गई। हाय इतना भयंकर प्रतिशोध। तनिक सा झूठ बोलकर रूपा ने मुझे वर्षों की घुटन और पीड़ा दे दी। मुझे शक के अंधेरे में धकेल दिया। जीवनभर का बदला एक पल में ले लिया। मेरे अंदर भयंकर तूफान उठा। मैं बेजान लाश बन गया। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। रूपा मुझे संभालो। मैं तुम्हारे पास आ रहा हूं। मुझे क्षमा कर दो।
मैं आ रहा हूं …रूपा-रूपा...।
