कब तक प्रधानों-पार्षदों के हक का उपयोग करेंगे पति

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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अनेक स्थानों पर महिला सरपंच और महिला पार्षद केवल नाम की प्रतिनिधि बनकर रह गई हैं, जबकि वास्तविक कामकाज उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य संभाल रहे हैं।

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डॉ. प्रियंका सौरभ,
शिक्षिका

 

भारत में लोकतंत्र की जड़ें केवल संसद, विधानसभा और बड़े राजनीतिक मंचों में नहीं, बल्कि गांवों, कस्बों और नगरों की स्थानीय संस्थाओं में भी गहराई से फैली हुई हैं। पंचायतें और नगर निकाय लोकतंत्र की वह सबसे छोटी, लेकिन सबसे जीवंत इकाई हैं, जहां जनता अपने प्रत्यक्ष प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन में भागीदारी करती है।

इन्हीं संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए संविधान ने आरक्षण का प्रावधान किया, ताकि वे केवल घरेलू दायरे तक सीमित न रहें, बल्कि निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकें, लेकिन सच्चाई यह है कि अनेक स्थानों पर महिला सरपंच और महिला पार्षद केवल नाम की प्रतिनिधि बनकर रह गई हैं, जबकि वास्तविक कामकाज उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य संभाल रहे हैं। यही स्थिति ‘सरपंच पति’ और ‘पार्षद पति’ जैसी संज्ञाओं को जन्म देती हैं।

यह प्रश्न केवल औपचारिकता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है। जब कोई महिला निर्वाचित होकर पद संभालती है, तो उसके पीछे जनता का विश्वास, संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक हिस्सेदारी होती है। यदि उसकी जगह कोई और व्यक्ति निर्णय लेता है, बैठकों में भाग लेता है या प्रशासनिक कार्य करता है, तो यह उस जनादेश का अपमान है, जिसे मतदाताओं ने दिया था। महिला प्रतिनिधि के नाम पर किसी पुरुष का सत्ता चलाना न केवल लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि यह आरक्षण नीति की मूल भावना को भी कमजोर करता है।

73वें और 74वें संविधान संशोधन ने भारत में स्थानीय स्वशासन को नया आयाम दिया। इन संशोधनों के माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया गया। उद्देश्य यह था कि महिलाएं पंचायतों में केवल संख्या के रूप में न दिखें, बल्कि नेतृत्व, प्रशासन, योजना-निर्माण और नीति-क्रियान्वयन में भाग लें।

इससे लाखों महिलाएं स्थानीय राजनीति में आईं, जिनमें अनेक ने असाधारण क्षमता, संवेदनशीलता और जनसंपर्क का परिचय दिया। कई महिला सरपंचों ने जल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि अवसर मिलने पर महिलाएं किसी भी तरह पुरुषों से कम नहीं हैं।

फिर भी यह सच है कि व्यापक सामाजिक संरचना आज भी पितृसत्तात्मक है। गांवों में, विशेषकर उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में, महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्र रूप से भाग लेने के लिए पर्याप्त सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। कई बार वे पढ़ी-लिखी होते हुए भी परंपरागत दबावों, पारिवारिक नियंत्रण और भय के कारण निर्णय लेने से बचती हैं।

कुछ जगहों पर तो विवाह के बाद महिला प्रतिनिधि की राजनीतिक पहचान लगभग समाप्त हो जाती है और उसका स्थान पति ले लेता है। परिणामस्वरूप उसका संवैधानिक अधिकार कागज़ पर तो बना रहता है, लेकिन व्यवहार में वह अधिकार परिवार के पुरुष सदस्य के हाथ में चला जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

समस्या की जड़ केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत दोनों है। कई परिवारों में यह मानसिकता बन गई है कि महिला प्रतिनिधि का पद वास्तव में ‘परिवार का पद’ है, जिसका संचालन पति या ससुर करेंगे। ऐसा सोचने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि निर्वाचित पद किसी परिवार को नहीं, एक व्यक्ति को मिला होता है।

कानून की दृष्टि से भी पदाधिकारी वही होता है, जिसे जनता ने चुना है। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके नाम पर निर्णय लेने लगे, तो यह प्रतिनिधि शासन की अवधारणा के विरुद्ध है। इससे न केवल महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित होती है, बल्कि यह भविष्य की महिला नेतृत्व पीढ़ी के लिए भी गलत संदेश देता है।

हरियाणा राज्य सूचना आयोग द्वारा इस मुद्दे पर की गई टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि महिला सरपंचों की जगह उनके पतियों का सरकारी बैठकों या प्रशासनिक कार्यों में भाग लेना गलत है। यह कथन केवल प्रशासनिक सख्ती का संकेत नहीं है, बल्कि यह इस सच्चाई की ओर भी इशारा करता है कि महिला आरक्षण को अभी भी गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता है।

यदि निर्वाचित प्रतिनिधि के अधिकार किसी और को सौंपे जाने लगें, तो फिर निर्वाचन प्रक्रिया का अर्थ ही क्या रह जाता है? आयोग की टिप्पणी ने इस बहस को फिर से राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया कि क्या हम वास्तव में महिलाओं को सत्ता दे रहे हैं, या केवल उनका नाम इस्तेमाल कर रहे हैं?

कई लोगों का तर्क होता है कि ग्रामीण महिलाएं अक्सर अशिक्षित, अनुभवहीन या सामाजिक दबाव में होती हैं, इसलिए उनके पति प्रशासनिक काम संभाल लेते हैं। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। किसी महिला की कमजोरी के कारण उसका अधिकार उससे छीन लेना न्यायसंगत नहीं हो सकता। (यह लेखक के निजी विचार हैं)