बरेली: हौसले से शुरू की कोरोना से जंग, अब भी जारी है लड़ाई
अमृत विचार, बरेली। स्वास्थ्य विभाग के लिए वर्ष 2020 काफी चुनौतियों भरा रहा। शुरुआती कुछ महीनों को छोड़ दें तो पूरा साल एक ऐसी महामारी से लड़ने में गुजर गया जिसकी न तो दवा थी और न ही उससे बचाव के पर्याप्त इंतजाम थे। यही वजह रही कि दूसरों की जिंदगी बचाने की कवायद में …
अमृत विचार, बरेली। स्वास्थ्य विभाग के लिए वर्ष 2020 काफी चुनौतियों भरा रहा। शुरुआती कुछ महीनों को छोड़ दें तो पूरा साल एक ऐसी महामारी से लड़ने में गुजर गया जिसकी न तो दवा थी और न ही उससे बचाव के पर्याप्त इंतजाम थे। यही वजह रही कि दूसरों की जिंदगी बचाने की कवायद में खुद स्वास्थ्यकर्मी भी इसकी जद में आ गए।
दो बुजुर्ग स्वास्थ्यकर्मियों और एक युवा डॉक्टर को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। साल खत्म होने को है। कोरोना का कहर कुछ कम तो हुआ है लेकिन खत्म नहीं हुआ। वैक्सीन अभी भी नहीं आई है। स्वास्थ्य कर्मी अब भी जान हथेली पर रखकर कोरोना से जंग लड़ रहे हैं।
जिले में कोरोना संक्रमण का पहला मामला मार्च में सुभाष नगर इलाके का सामने आया था।
सुभाष नगर निवासी एक युवक नोएडा की अग्निशमन यंत्र बनाने वाली कंपनी में काम करता था। बरेली में सबसे पहले उसी युवक और उसके परिवार के पांच अन्य सदस्यों में कोरोना की पुष्टि हुई थी। इसके बाद जिले में स्वास्थ्यकर्मियों की कोरोना से असल जंग शुरू हुई। सबसे बड़ी चुनौती खुद को सुरक्षित रखकर दूसरों की जिंदगी बचाने की थी।
नाकाफी सुरक्षा इंतजामों के बावजूद स्वास्थ्यकर्मियों के कदम नहीं डगमगाए। यही वजह थी कि कई स्वास्थ्यकर्मियों के साथ ही सीएमओ, एसीएमओ और चिकित्सक तक इस महामारी की चपेट में आए।
कोरोना काल में पैरामेडिकल स्टाफ ने भी सराहनीय भूमिका निभाई। विदेशों से आने वाले लोगों की स्वास्थ्य जांच करने के साथ ही रेड जोन में शामिल शहरों से आए लोगों की जांच करते-करते लगातार पैरामेडिकल कर्मचारी संक्रमित होते रहे लेकिन उनके हौसले इतने बुलंद थे कि कोरोना को मात देकर फिर डट गए लोगों को इस महामारी से बचाने के लिए। कोरोना ने जिले की स्वास्थ्य सेवाओं को बुरी तरह प्रभावित किया।
लॉकडाउन के चलते न सिर्फ सरकार की अन्य जरूरी स्वास्थ्य योजनाओं को रोकना पड़ा बल्कि जिला अस्पताल समेत निजी चिकित्सालयों की ओपीडी को भी बंद करना पड़ा। आपातकाल की स्थिति में ही मरीजों को देखा जा रहा था। स्वास्थ्यकर्मी जान जोखिम में डालकर संदिग्धों की जांच करने से लेकर संक्रमितों के उपचार में लगे रहे।
ऐसे में स्वास्थ्यकर्मियों का नया नामकरण कोरोना योद्धा के रूप में हुआ। तमाम दिक्कतों और दुश्वारियों के बाद भी चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ कोरोना से जंग लड़ता रहा औरर अब भी लड़ रहा है।
अस्पतालों में भर्ती मरीजों और तीमारदारों को उठानी पड़ीं दिक्कतें
लॉकडाउन में एक वक्त ऐसा भी था जब निजी अस्पतालों में मरीज भर्ती थे। कुछ के ऑपरेशन हुए थे तो कुछ के होने वाले थे। ऐसे समय में लॉकडाउन लगने के बाद चिकित्सक उन सभी को डिस्चार्ज करने पर मजबूर हो गए जिनका ऑपरेशन तत्काल हो चुका था या बहुत जरूरी नहीं था। जो अस्पताल में फंसे रहे उनके लिए निजी अस्पताल संचालकों ने अपने पास से नाश्ते से लेकर भोजन तक की व्यवस्था करवाई। वहीं, कुछ निजी अस्पतालों में कैंटीन की व्यवस्था थी जिससे तीमारदारों और मरीजों का कार्य चलता रहा।
28 अप्रैल को हुई कोरोना से पहली मौत
28 अप्रैल को जिले में कोरोना से पहली मौत हुई। कोविड लेवल-2 अस्पताल में भर्ती नगर निगम क्षेत्र के हजियापुर निवासी कोरोना संक्रमित की मौत हुई थी। मृतक की परिजन ने स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप भी लगाए थे। मृतक डायबिटीज का मरीज था, उसके साथ उसकी पत्नी का विलाप करते हुए गाना गाने का वीडियो भी वायरल हुआ था।
एक नजर कोरोना पर
जिले में कुल संक्रमित 14048
स्वस्थ हुए 5093
सक्रिय केस 376
कोरोना से मौत 161
कुल लिए गए सैंपल 447148
