अक्षर विहार तालाब: प्रभावशाली लोगों से भूमि खाली कराने में प्रशासन फेल

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

अमृत विचार, बरेली। सांठगांठ के तहत बेची गई अक्षर विहार तालाब की करोड़ों रुपये की भूमि को मुक्त कराना आसान नहीं दिख रहा है। प्रभावशाली लोगों के आगे प्रशासन की कार्रवाई भी फेल नजर आ रही है। मार्च, 2020 से तालाब की भूमि को नजूल भूमि संग फ्रीहोल्ड कराकर बेचने के प्रकरण की जांच चल …

अमृत विचार, बरेली। सांठगांठ के तहत बेची गई अक्षर विहार तालाब की करोड़ों रुपये की भूमि को मुक्त कराना आसान नहीं दिख रहा है। प्रभावशाली लोगों के आगे प्रशासन की कार्रवाई भी फेल नजर आ रही है। मार्च, 2020 से तालाब की भूमि को नजूल भूमि संग फ्रीहोल्ड कराकर बेचने के प्रकरण की जांच चल रही है।

दिसंबर, 2020 को यह स्पष्ट हो गया कि 2000 वर्ग गज से अधिक भूमि साठगांठ से बेची गई। नजूल भूमि प्रभारी एवं एडीएम वित्त एवं राजस्व मनोज कुमार पांडेय ने एक माह पूर्व एसडीएम सदर और नगर आयुक्त को पत्र लिखकर तालाब की भूमि से अतिक्रमण हटवाने को पत्र लिखा था, लेकिन न एसडीएम सदर और न ही नगर आयुक्त ने पत्र का संज्ञान लिया।

अधिकारी तालाब की भूमि को खाली कराने से बच रहे हैं। प्रशासन इसलिए बच रहा है, क्योंकि पार्क का प्रबंधन नगर निगम कर रहा है। बचने का एक और कारण है, नजूल भूमि से संबंधित सभी रिकार्ड नगर निगम में ही रहते हैं, जबकि प्रदेश भर के जिलों में नजूल भूमि के रिकार्ड कलेक्ट्रेट में रहते हैं।

दशकों पूर्व से नगर निगम ही नजूल रिकार्डों को संभाले आ रहा है। किसी जिलाधिकारी ने नजूल के रिकार्ड को कलेक्ट्रेट में रखवाने के लिए कोई पहल नहीं की है। यही वजह है कि नजूल भूमि पर अतिक्रमण से संबंधित मामलों में प्रशासन भी कार्रवाई से बचते नजर आता है।

दोनों फ्रीहोल्ड मामलों की पड़ताल में बाहर आया सांठगांठ का खेल
अक्षर विहार तालाब की 6500 वर्ग गज भूमि वर्ष 1999 में फ्रीहोल्ड कराई गई थी। इसके बाद वर्ष 2012-13 में 4500 वर्ग गज भूमि फ्रीहोल्ड कराई गई थी। दोनों मामलों की फाइलों के मिलान के बाद यह मालूम हुआ कि तालाब की कितनी भूमि साठगांठ से बेची गई। यह बात भी सामने आई कि कैंट की तरफ से अक्षर विहार पार्क की चपेट से जो रोड बनी है, वह पार्क की भूमि में ही शामिल है।

जांच में वर्ष 1999 में फ्रीहोल्ड की गई भूमि में गड़बड़ी की बात खुली थी। तब नजूल भूमि को न बेचने से संबंधित कोई शासनादेश लागू नहीं था। बता दें कि नजूल के साथ तालाब की भूमि बेचने के प्रकरण की जांच मंडलायुक्त के निर्देश पर डीएम ने एडीएम वित्त के नेतृत्व में जांच कराई। वर्ष 2016 में भी मामला तेजी से उछला था। तब तत्कालीन अपर जिलाधिकारी प्रशासन (वर्तमान में अपर आयुक्त प्रशासन बरेली मंडल) अरुण कुमार ने जांच की थी, लेकिन जांच आख्या की फाइल अपर जिलाधिकारी वित्त कार्यालय में दबा दी गई थी।

संबंधित समाचार