मुरादाबाद: बेबसी में मुस्कुराने का जरिया बनी दिव्यांग की ट्राई साइकिल

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मुरादाबाद, अमृत विचार। हैरानी से देखते हैं वो हमें, तुम से अलग हम भी नहीं, काबिल हो तुम अगर तो, न काबिल हम भी नहीं। यह पंक्तियां साढ़े तीन फुट के मो. शमशाद अली पर सटीक बैठती हैं, क्योंकि वो दूसरों की तरह चल नहीं सकता, उसकी पत्नी भी दिव्यांग है। न कोई सहारा, न …

मुरादाबाद, अमृत विचार। हैरानी से देखते हैं वो हमें, तुम से अलग हम भी नहीं, काबिल हो तुम अगर तो, न काबिल हम भी नहीं। यह पंक्तियां साढ़े तीन फुट के मो. शमशाद अली पर सटीक बैठती हैं, क्योंकि वो दूसरों की तरह चल नहीं सकता, उसकी पत्नी भी दिव्यांग है। न कोई सहारा, न कोई मददगार, किस्मत ने उसे जख्म दिए और सरकारी व्यवस्था उन जख्मों को कुरेदने में लगी है। उसके सिर पर पांच साल की बच्ची के पालन-पोषण की जिम्मेदारी है।

बस यही एक जिम्मेदारी इस बेबसी में उनके मुस्कुराने की वजह है। वह ट्राइसाइकिल पर गली-मोहल्लों में फेरी लगाकर बच्चों की मुस्कान बेचता है। फिलहाल बच्चों की मुस्कान बेचने वाला खुद मायूस है और उसे किसी मसीहा का इंतजार है।

दिव्यांग व्यक्ति शरीर से नहीं दिमाग से होता है। मैं दिव्यांग हूं तो क्या, लेकिन काम करने में सक्षम हूं। ऐसा ही जज्बा है हड्डी मिल काशीराम कालोनी निवासी मोहम्मद शमशाद अली की।  दिव्यांगता को दरकिनार कर खुद अपनी किस्मत को संवारने में लगा है। जन्म के बाद से मोहम्मद शमशाद दिमागी रूप से तो बड़ा हो गया लेकिन शारीरिक रूप से वह बच्चा ही रह गया। केवल साढ़े तीन फुट के शमशाद अपना जीवन यापन करने के लिए बच्चों की मुस्कान, यानि की गुब्बारे, खिलौने बेचते हैं।

इस काम में उनका साथ देती हैं दिव्यांग पत्नी तस्लीमा। वह पूरी तरह से चल नहीं सकती है। लेकिन, हर कदम में पति शमशाद के साथ खड़ी नजर आती हैं। शनिवार को कांठ रोड पर गुब्बारे बेचते समय जब अमृत विचार के प्रतिनिधि ने शमशाद से बातचीत की तो उसका दर्द आंखों में भर आया। बोला साहब मैं दिव्यांग नहीं लोगों की सोच दिव्यांग हो चुकी है। मैं अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहता हूं। इसके लिए मैं रोजाना गली-मोहल्ले में खिलौने बेचता हूं।

रहमदिल ने दिलाई थी जुगाड़ गाड़ी, वह भी बिक गई
शमशाद ने बताया कि वह पहले गुब्बारे बेचा करते थे। ट्राई साइकिल के चारो ओर गुब्बारे बांधकर वह गलियों में फेरी लगाया करते थे। कई साल तक उन्होंने गुब्बारे बेचने का काम किया। रोजाना कई-कई किलोमीटर तक वह हाथों से ट्राई साइकिल के पहिए खींचा करते थे। आखिरकार एक दिन उनकी यह मेहनत किसी रहमदिल को पसंद आ गई। उसने दूसरा काम करने की सलाह दी तो शमशाद की दिव्यांगता आड़े आ गई। फिर उस रहमदिल ने करीब 40 हजार की लागत से एक जुगाड़ गाड़ी बनवाकर शमशाद को दी। लेकिन, लॉकडाउन ने ऐसी कमर तोड़ी कि अब वह जुगाड़ गाड़ी भी बेचनी पड़ गई।

सरकारी मदद की है दरकार
मेहनतकश शमशाद की सरकारी सिस्टम ने कोई सुध नहीं ली। कारोबार के लिए कई दफा उसने लोन के लिए आवेदन किया। प्रशासन से लेकर बैंक अफसरों तक के दरबार में जाकर हाजिरी दी लेकिन आज तक लोन नहीं मिल सका। मजबूरन कुछ जमा-पूंजी से उसने यह काम शुरू कर दिया। ऐसे में अब उसे सरकारी मदद की दरकार है। जिससे वह अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर डाक्टर बनाना चाहता है।

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