हल्द्वानी: असंतोष की ज्वाला के बीच ‘तीरथ’ चली भाजपा

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मनोज लोहनी, हल्द्वानी। किसी को नहीं मालूम था कि सब कुछ ठीकठाक और नियंत्रित तरीके से चल रहे त्रिवेंद्र सरकार में अंदर से क्या चल रहा है। मुख्मयंत्री त्रिवेंद्र न केवल कामकाज के तौर-तरीकों बल्कि अपनी शारीरिक हावभाव से भी अब काफी चुस्त लग रहे थे और उसी लिहाज से नए-नए निर्णय भी ले रहे …

मनोज लोहनी, हल्द्वानी। किसी को नहीं मालूम था कि सब कुछ ठीकठाक और नियंत्रित तरीके से चल रहे त्रिवेंद्र सरकार में अंदर से क्या चल रहा है। मुख्मयंत्री त्रिवेंद्र न केवल कामकाज के तौर-तरीकों बल्कि अपनी शारीरिक हावभाव से भी अब काफी चुस्त लग रहे थे और उसी लिहाज से नए-नए निर्णय भी ले रहे थे। आत्मविश्वास से लबरेज त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जब सबको चौंकाते हुए गैरसेंण को नई कमिश्नरी बनाने का ऐलान कर दिया तो उसका यह संदेश गया कि एक पावरफुल सीएम अब चुनावी साल में और भी कई बड़े फैसलों से जनता को हैरान कर सकता है। मगर अगले ही पल गद्दी बदल गई। बाहर से सब कुछ ठीक दिखने वाली सरकार में एक झटके में ही उलट-पुलट हो गया। तो जाहिर सी बात है पार्टी के भीतर ऐसा तूफान जरूर उठा होगा जिसने पल भर में राज्य ने नेतृत्व परिवर्तन कर दिया। तो यह तूफान हल्का तो था नहीं, ऐसा प्रचंड था कि हाईकमान तक हिल गया और फिर तीरथ सिंह रावत के रूप में राज्य को नया मुख्यमंत्री मिल गया।

त्रिवेंद्र सिंह रावत को जिन कारणों से मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी वह कारण कोई छोटा तो रहा नहीं होगा। लिहाजा तीरथ की चुनौती वहीं से शुरू होती है जिस चुनौती से पार नहीं पा सकने के चलते त्रिवेंद्र को राजगद्दी से हटना पड़ा। राजनीति के जानकार कहते हैं कि नेतृत्व परिवर्तन वह भी चुनाव में जाने से केवल 9 माह पहले किसी बड़ी वजह और बड़े असंतोष के चलते ही हुआ। तो उस असंतोष को समझते हुए उससे निपटने के लिए तीरथ सिंह रावत क्या कदम उठाते हैं, यह उनके मंत्रिमंडल गठन के साथ ही उनकी कार्यशैली से भी समझ आ जाएगा। भाजपा हाईकमान ने त्रिवेंद्र को हटाकर तीरथ को गद्दी सौंपी है तो इसका मतलब साफ है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि असंतोष के वह सारे कारण अब ‘तीरथ’ पर आकर रुक जाएंगे। सबसे पहली चुनौती तीरथ सिंह रावत के सामने इस बात को समझने की ही होगी कि वह क्या ठोस कारण रहा जिस कारण त्रिवेंद्र को जाना पड़ा। इसके बाद बारे आएगी उस चुनौती से पार पाने की।

त्रिवेंद्र की विदाई के पीछे शुरुआती कारण विधायकों के असंतोष को ही माना जा रहा है। विधायकों का असंतोष किन कारणों से था, यह भी समझने की बात होगी। समझा जाता है कि जीरो टॉलरेंस की नीति त्रिवेंद्र सरकार के ऊपर इतनी हावी हो गई थी कि उस कारण मंत्री, विधायकों के बातों की भी अनसुनी होने लगी और जहां मंत्री, विधायकों को हावी होना था वहां नौकरशाही हावी हो गई। विधानसभा उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह चौहान प्रकरण जिसमें विशेषाधिकार हनन का मामला होने के बावजूद जिलाधिकारी को नहीं हटाया गया, राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार रेखा आर्या की एक विभागाध्यक्ष से तकरार के साथ ही कई अन्य ऐसे मामले रहे जहां मंत्री, विधायकों की नहीं सुनी जा रही थी। अब नए सीएम के आने के बाद इन स्थितियों में क्या कोई बदलाव होगा?

अबकी बार 60 पार

प्रदेश भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए ‘अबकी बार 60 पार’ का नारा रखा है। राज्य के नए मुख्यमंत्री के सामने इस चुनौती से पार पाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी। वह भी तब जब उनके पास कार्य करने के लिए केवल 9 माह का समय बचा है। काफी समय तो सरकार को कार्यशैली बनाने में ही लग जाता है। लिहाजा चुनावी साल में तीरथ सिंह रावत की यही सबसे बड़ी परीक्षा होगी, ऐसा राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं। ऐसे में ‘अबकी बार 60 पार’ के नारे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए तीरथ सिंह रावत को सभी को साथ लेकर चलते हुए राज्य की अंदरूनी राजनीति को भी साधना होगा।

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