मुरादाबाद: मुश्किल में फंसे उपभोक्ता, वादों का नहीं हो पा रहा निस्तारण
मुरादाबाद, अमृत विचार। मल्टीनेशनल कंपनियों के बाजार में बढ़ते प्रभाव ने कहीं न कहीं उपभोक्ताओं को भी मुश्किल में डाल दिया है। बेहतर सुविधा देने के तमाम वादों के बाद भी उपभोक्ताओं को वह सहूलियत नहीं मिल पाती, जिसके लिए वो अपनी जेब ढीली कर रहे हैं। संबंधित कंपनियों में शिकायत करने के बाद भी …
मुरादाबाद, अमृत विचार। मल्टीनेशनल कंपनियों के बाजार में बढ़ते प्रभाव ने कहीं न कहीं उपभोक्ताओं को भी मुश्किल में डाल दिया है। बेहतर सुविधा देने के तमाम वादों के बाद भी उपभोक्ताओं को वह सहूलियत नहीं मिल पाती, जिसके लिए वो अपनी जेब ढीली कर रहे हैं।
संबंधित कंपनियों में शिकायत करने के बाद भी जब सुनवाई नहीं होती है तो न्याय के लिए ग्राहक उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाने के लिए बाध्य होता है। बदकिस्मती देखिए, यहां भी वह तारीख के मकड़जाल में फंस कर रह जाता है। कंपनियों द्वारा लुटने के बाद भी लंबे समय तक उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है। न्याय की आस में भटक रहे उपभोक्ताओं की मुश्किलें जागरूकता की कमी और आयोग में स्टाफ के टोटे ने और बढ़ा दी हैं।
मल्टीनेशनल कंपनियों के अलावा सरकारी विभाग के अफसर भी उपभोक्ताओं के साथ छलावा करने से बाज नहीं आ रहे हैं। खासतौर पर जिन कार्यालयों में बिलिंग संबंधी काम होते हैं, वहां पर अक्सर उपभोक्ता सरकारी सिस्टम को कोसते हुए मिल जाएंगे। अगर बिजली का बिल भी सुधरवाना है तो अफसर और कर्मचारी कार्यालय के इतने चक्कर लगवाते हैं कि उपभोक्ता थक-हार कर कर्मचारियों से समझौता करने तक को तैयार हो जाते हैं। वहीं आटो मोबाइल, इलेक्ट्रानिक कंपनियां और बीमा कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं के साथ ठगी करने के मामले भी अक्सर सामने आते हैं। यह ठगी कभी प्रोडक्ट की सर्विस के नाम पर तो कभी क्लेम के नाम पर की जा रही है।
केंद्र सक्रिय तो राज्य सरकार है उदासीन
ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी करने वालों पर शिकंजा कसने का प्रयास नहीं किया। इसके लिए पुराने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 को समाप्त कर नया उपभोक्ता कानून लाया गया। केंद्र सरकार की मंशा थी कि जल्द उपभोक्ताओं की समस्याओं का निदान कर उनको न्याय दिलाया जाए। इसके दूरगामी परिणाम भी मिले। पूरे देश में लाखों की संख्या में वादों का निस्तारण किया गया। लेकिन, बाद में राज्य सरकार की उदासीनता आड़े आ गई। इस कारण आयोग में स्टाफ का टोटा हो गया है। प्रदेश के न्यायालयों में सदस्य और स्टाफ की कमी के कारण वादों का निस्तारण नहीं हो सका है। मुरादाबाद स्थित दोनों उपभोक्ता आयोग का भी यह ही हाल है। नियमानुसार दोनों फोरम में एक-एक अध्यक्ष व दो-दो सदस्य होने चाहिए। मौजूदा समय में आयोग प्रथम में अध्यक्ष देवेंद्र कुमार व एक सदस्य की तैनाती है। महिला सदस्य का पद रिक्त है। आयोग द्वितीय में अल्का श्रीवास्तव अध्यक्ष व रुचिका श्रीवास्तव महिला सदस्य हैं। यहां पर पुरुष सदस्य का पद लंबे समय से रिक्त है।
20 जुलाई 2020 को फोरम से बना आयोग
1986 में जब केंद्र सरकार ने नया उपभोक्ता कानून लागू किया था, तब इसका नाम उपभोक्ता फोरम रखा गया था। दशकों से इसे उपभोक्ता फोरम ही कहा जाता है। हालांकि वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने कानून के साथ ही नाम में परिवर्तन करने की पहल की। काफी समय तक चली पहल के बाद कानून में बदलाव हुआ तो वहीं 20 जुलाई 2020 को फोरम का नाम बदलकर उपभोक्ता आयोग कर दिया गया।
दोनों आयोग में करीब एक हजार वाद चल रहे हैं लंबित
स्टाफ के टोटे के कारण मौजूदा समय में मुरादाबाद के दोनों उपभोक्ता फोरम में करीब एक हजार वाद लंबित चल रहे हैं। लंबे समय से फरियादी न्याय के लिए फोरम के चक्कर लगा रहे हैं। फोरम से जुड़े लोगों के अनुसार कई मामलों में उपभोक्ताओं को न्याय के लिए तीन साल तक इंतजार करना पड़ा है। न्याय में होने वाली देरी के कारण उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है। निस्तारण की बात करें तो वर्ष 2019 और 20 में करीब 45 उपभोक्ताओं के हित में फैसला आ सका है। सम्भल जिले के हालात तो और भी खराब हैं। वर्ष 2014 में उपभोक्ता फोरम खुलने के बाद भी स्टाफ की कमी के कारण निस्तारण की प्रक्रिया रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। यह आलम तब है, जब सरकार प्रत्येक न्यायालय में हर माह पांच से छह लाख रुपये खर्च करती है।
प्रशासनिक हीला-हवाली के कारण नहीं मिल रहा न्याय : देवेंद्र वार्ष्णेय
मुरादाबाद। उपभोक्ता आयोग में समय से न्याय न मिल पाने की वजह प्रशासनिक हीला-हवाली बताई जा रही है। इस मामले में आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता देवेंद्र वार्ष्णेय का कहना है कि केंद्र सरकार ने 20 जुलाई 2020 से आयोग के अधिकारों में बढ़ोत्तरी कर दी। पहले जहां 20 लाख मामलों की सुनवाई हो सकती थी तो अब उसे बढ़ाकर एक करोड़ कर दिया गया है। लेकिन, सही तरीके से मानीटरिंग न होने के कारण उपभोक्ताओं को समय से न्याय नहीं मिल पाता है। आयोग के आदेश की अनदेखी करने वालों को अब तीन वर्ष तक की सजा दी जा सकती है। लेकिन, समय से सुनवाई और फैसला न आने के कारण उपभोक्ता को नए कानून का लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। अगर मुकदमों को समय सीमा के अंदर तय करने की जवाबदेही तय होने के साथ ही स्टाफ की कमी को दूर कर दिया जाए तो नए कानून का लाभ उपभोक्ताओं को आसानी से मिल जाएगा।
