बरेली: 2022 विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल में भाजपा सांसद और विधायक ‘फेल’

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। भाजपा पंचायत चुनाव को 2022 में होने वाले विधानसभा का सेमीफाइनल मानकर लड़ रही थी। इसलिए जिला पंचायत सदस्य की 60 सीटों को जीतने के लिए तीन माह पहले ही तैयारी शुरू कर दी थीं लेकिन सीटों के जो परिणाम सामने आए। उसमें 2022 विस के सेमीफाइनल में बरेली जनपद के सांसद …

बरेली, अमृत विचार। भाजपा पंचायत चुनाव को 2022 में होने वाले विधानसभा का सेमीफाइनल मानकर लड़ रही थी। इसलिए जिला पंचायत सदस्य की 60 सीटों को जीतने के लिए तीन माह पहले ही तैयारी शुरू कर दी थीं लेकिन सीटों के जो परिणाम सामने आए। उसमें 2022 विस के सेमीफाइनल में बरेली जनपद के सांसद और विधायक फेल नजर आए।

दो दिन की मतगणना के बाद बुधवार शाम जिला प्रशासन की ओर से पंचायत चुनाव के परिणाम घोषित किए गए। जिला पंचायत सदस्य की 60 सीटों के आए परिणाम ने भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। भाजपा समर्थित 60 उम्मीदवारों में 47 को हार का मुंह देखना पड़ा। मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशियों पर भी खूब विश्वास जताया। सपा समर्थित 25 और बसपा समर्थित छह उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की।

घोषित परिणामों में 13 सीटें निर्दलीय के खाते में चली गई। अब जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के लिए घमासान तेज हो गया है, क्योंकि जिपं अध्यक्ष पद पर जीत के लिए 31 सदस्यों का बहुमत होना जरूरी है, जो अभी किसी भी दल के पास नहीं है। ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका अहम होगी। वह जिस तरफ झुके, वह कुर्सी ले जाने में सफल हो सकता है। फिलहाल, खरीद फरोख्त, जुगाड़बंदी के खेल की आशंकाएं चर्चाओं में चलनी शुरू हो गई हैं।

इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष पद ओबीसी के लिए आरक्षित है। इस पद को लेकर सत्तारूढ़ दल का दावा हमेशा से मजबूत रहा है। चाहे बहुमत हो या न हो, लेकिन सत्ता के बल पर अध्यक्ष पद की कुर्सी हथियाने की परंपरा काफी पुरानी है। भाजपा ने इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना दावा मजबूत करने के लिए सभी 60 सीटों पर समर्थित प्रत्याशी उतारे थे। बसपा ने 55 और सपा ने भी करीब 60 सीटों पर समर्थित उम्मीदवार उतारे थे।

भाजपा में टिकट न मिलने से कई बागी उम्मीदवार भी मैदान में डटे थे, जिसमें कई ने जीत दर्ज की। वहीं, कई अन्य सीटों पर बागियों ने भाजपा की जीत का गणित बिगाड़ दिया तो कुछ सीटों पर भितरघात का भी असर रहा, जिससे भाजपा प्रत्याशियों को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई। जबकि जनपद की सभी नौ विधानसभा और दो लोकसभा क्षेत्रों पर भाजपा के विधायक और सांसद हैं। ऐसे में जिला पंचायत सदस्य पद के चुनाव में करारी हार से कहीं न कहीं भाजपा विधायकों और सांसदों की लोकप्रियता कम होने के संकेत मिल रहे हैं।

जिस दल की सत्ता, उसी का अध्यक्ष बनाने की पुरानी परंपरा
जिला पंचायत अध्यक्ष पद के महत्वपूर्ण होने का इसी बात से अंदाजा लगता है कि प्रदेश में जिस दल की सरकार रहती है, उसी का अध्यक्ष भी बनता है। यदि अध्यक्ष के कार्यकाल के बीच में सरकार बदलती है, तो उसके साथ ही अध्यक्ष का बदलना भी तय हो जाता है। 2015 के पंचायत चुनाव में प्रदेश में सपा सरकार थी, जिसमें संजय सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे। 2017 में भाजपा की सरकार बनी। संजय सिंह ने भाजपा की और पाला बदल दिया। इससे पहले 2010 में पंचायत चुनाव के समय बसपा की सरकार थी तो तत्कालीन बसपा विधायक रहे वीरेंद्र गंगवार ने अपनी भाभी नीरू पटेल को अध्यक्ष बनाया था। 2012 में सपा की सरकार बनी तो जांच बैठाकर इनको हटा दिया गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट से स्टे मिला तो नीरू पटेल ने कार्यकाल पूरा किया। इससे पहले की सरकारों में भी जिला पंचायत अध्यक्ष पद को लेकर घमासान चलता रहा।

अपने जीतने में कम, दूसरे को हराने में जुटे रहे
पंचायत चुनाव में खासकर भाजपा में जो भी जिला पंचायत अध्यक्ष बनने का दावा कर चुनाव लड़े। वह तकरीबन सभी चुनाव हार गए। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह रहा कि कुछ उम्मीदवारों को अपने जीतने की कम, दूसरे को हराने की अधिक चिंता सता रहीं थी। कुछ विधायकों ने भी अपने उम्मीदवारों को हराने में अहम भूमिका अदा की। जिसकी वजह से भाजपा की किरकिरी हुई है। दल के कुछ जिम्मेदार लोगों ने भी चुनाव में दल के बागियों को चुनाव लड़ाकर एक दूसरे को हराने में अहम भूमिका निभाई। वैसे उम्मीदवारों ने चुनाव जीतने के लिए हर जतन किया है। मतदाताओं को लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। तमाम-दावे वादे किए गए थे। बड़े-बड़े आश्वासन एवं भविष्य में एक दूसरे का साथ निभाने का वादा किया, फिर भी सफलता उनके हाथ नहीं लगी।

कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल सका
जिला पंचायत वार्डों के चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला है। जबकि कांग्रेस ने 38 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। दमदारी से चुनाव लड़ने का दावा भी किया था, लेकिन निराशा हाथ लगी। वहीं, बरेली से एक कांग्रेस प्रत्याशी की ओर से सोशल मीडिया पर डाली पोस्ट खूब वायरल हो रही है। उसमें अपने प्रतिद्वंदी को ही भतीजा बताते हुए उसकी जीत पर बधाई दी है। साथ ही कहा कि वह अपने मकसद में कामयाब हो गया। बताया जा रहा है कि यह प्रत्याशी हाल ही में सपा छोड़कर कांग्रेस में आया था। पोस्ट वायरल होने के बाद कांग्रेस में काफी घमासान मचा हुआ है।

पहले घर से नहीं निकले, अब झेलनी पड़ रही फजीहत
पंचायत चुनाव के बहाने भाजपा, सपा, बसपा कांग्रेस सहित राजनीतिक दलों की मंशा प्रदेश में अगले साल 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपने दल की मजबूती की थाह लेना मकसद रहा है लेकिन इसके बावजूद कुछ को छोड़ दिया जाए तो भाजपा के बड़े नेता घर से बाहर पंचायत चुनाव में प्रचार के लिए नहीं निकले।  चुनाव प्रचार न करने के पीछे भाजपा के बड़े नेताओं की मंशा एवं मजबूरी जो भी रही हो, लेकिन चुनाव लड़ रहे कार्यकर्ताओं में हार के बाद उनके मन में खोट पैदा हो गई है। अगर, चुनाव परिणाम पर गौर किया जाए तो ऐसा ही विधानसभा में स्थिति रही तो भाजपा अपना खाता भी नहीं खोल पाएगी। दूसरी तरफ सपा जिलाध्यक्ष अगम मौर्या का मैनेजमेंट जबरदस्त रहा। उनके नेतृत्व में पार्टी पदाधिकारियों ने उम्मीदवारों को चुनाव जीतने के लिए हर जतन किया। पूर्व मंत्री और कुछ विधायकों ने भी अपने उम्मीदवारों को जिताने में अहम भूमिका अदा की है।

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