बीसलपुर: चार वर्षीय संक्रमित पुत्र के लिए मां बन गए पिता
बीसलपुर, अमृत विचार। दूसरों के लिए सहारा बनने वाली शिक्षिका एवं समाजसेविका मीरा सक्सेना की कोरोना संक्रमण से मौत के बाद संक्रमित हुए उनके 4 वर्षीय पुत्र देवांश के लिए संक्रमित पिता ही यशोदा मां बन गए हैं। बच्चे को संक्रमण से बचाने से लेकर उसकी परवरिश करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। होम आइसोलेट …
बीसलपुर, अमृत विचार। दूसरों के लिए सहारा बनने वाली शिक्षिका एवं समाजसेविका मीरा सक्सेना की कोरोना संक्रमण से मौत के बाद संक्रमित हुए उनके 4 वर्षीय पुत्र देवांश के लिए संक्रमित पिता ही यशोदा मां बन गए हैं। बच्चे को संक्रमण से बचाने से लेकर उसकी परवरिश करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। होम आइसोलेट पिता-पुत्र का उपचार चल रहा है।
मोहल्ला ग्यासपुर निवासी शिक्षिका मीरा सक्सेना जो पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्या विद्यालय की प्रधानाध्यापिका थी। पंचायत चुनाव ड्यूटी के दौरान कोविड-19 से संक्रमित हो गई थीं। 8 मई को उनकी सांसे थम गई। 55 वर्षीय शिक्षिका की मौत बाद उनका 4 वर्षीय पुत्र देवांश व पति राजेंद्र सक्सेना भी संक्रमित हो गए। जो घर कल तक खुशियों से आनंदित रहता था, जहां से कई गरीब बेसहारा कन्याओं की शादी कराई गई थी। मोहल्ले के गरीब बेसहारा बच्चे जिस घर में आकर शिक्षिका मीर सक्सेना से नि:शुल्क पढ़ा करते थे।
उनकी मौत के बाद उस घर में दु:खों का ऐसा मातम छाया कि सब कुछ उजड़ा सा देखने लगा। शिक्षिका की मौत के बाद पिता-पुत्र के संक्रमित होने की बात जब पड़ोसियों व रिश्तेदारों पता हुई को सभी ने दूरियां बनाना शुरू कर दीं। संकट के क्षणों में पिता राजेंद्र सक्सेना ने साहस नहीं तोड़ा।
उनके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी 4 वर्षीय इकलौते बेटे के जीवन को बचाने के साथ स्वयं भी संक्रमण से बचने की थी। घर पर ही उन्होंने बेटे के साथ होम आइसोलेट रहकर इलाज शुरू किया। वह बेटे के लिए मां यशोदा बन गए। मां के लिए जब बेटा घंटों रोता था तो वह उसे दुलार कर पूरी-पूरी रात चुपाने का प्रयास करते हैं। बेटे को दुलार करने के साथ ही समय पर दूध के साथ दवाई पिलाना पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं। मां की कमी महसूस न हो इसके लिए वह उसे लोरियां भी सुनाते हैं।
पिता-पुत्र के संक्रमित होने के 10 दिन से अधिक गुजर चुके हैं। खतरा लगभग टल चुका है। शिक्षिका की कमी परिवार के लिए असहनीय बन गई है। उनकी मौत से परिवार की सारी खुशियों को ग्रहण लग गया है। पिता ही इकलौते बेटे का सहारा बने हैं। राजेंद्र सक्सेना ने बताया कि वह मृतक आश्रित के तहत स्वयं नौकरी नहीं करेंगे, बेटे की अच्छी परवरिश करने के लिए उसका पूरा ख्याल रखेंगे, हर पल उसके साथ ही रहेंगे।
आंसुओं ने सिखाया साथ रहना
पत्नी की मौत के बाद संक्रमित हुए पिता-पुत्र से जब अपनों ने दूरियां बना ली। तो दोनों ने आपस में आंसू बहा कर एक-दूसरे को दुलार किया। अब तो देवांश ने पिता की गोद में बैठ कर उनसे बातें करना सीख लिया है। पहले मां ही उसके लिए सबसे अधिक दुलार किया करती थी। स्कूल से आने पर वह उनसे लिपट जाया करता था। परंतु अब पिता ही मां का भी दुलार दे रहे हैं। मासूम देवांश पिता से रोते हुए अभी भी कहता है। पापा मम्मी कब आएंगी। बेटे के करुणामय शब्द पिता के लिए रुला रहे हैं। दु:ख की बेला में पिता-पुत्र एक-दूसरे का सहारा बन गए हैं।
समाज सेविका के रूप में जानी जाती थीं मीरा सक्सेना
शिक्षिका मीरा सक्सेना वह शख्सियत थीं जिनमें समाजसेवा कूट-कूटकर भरी थी। बचपन मे 10 वर्ष की आयु में जब उनके इकलौते भाई की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। तो वह टूट गई थीं। कई माह तक भाई की मौत से सदमे में रहीं। बाद में उन्होंने बेसहारा लोगों को सहारा देना जीवन का लक्ष्य बना लिया। पिता राम आसरे लाल अपनी छोटी सी आमदनी से बमुश्किल घर चला पाते थे। पिता का सहारा देने के लिए उन्होंने प्राइवेट स्कूल में नौकरी की।
