प्रधानमंत्री आवास योजना में शहरी मकानों का लक्ष्य हुआ मुश्किल

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संजय सिंह, अमृत विचार। नई दिल्ली। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शहरों में जिस रफ्तार से मकान बन रहे हैं उनसे निर्धारित अवधि में 1.12 करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। देश के गरीब, अल्प व मध्यम आय वर्ग के लोगों की आवास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार ने …

संजय सिंह, अमृत विचार। नई दिल्ली। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शहरों में जिस रफ्तार से मकान बन रहे हैं उनसे निर्धारित अवधि में 1.12 करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। देश के गरीब, अल्प व मध्यम आय वर्ग के लोगों की आवास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार ने जून, 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना का ऐलान किया था। इसके तहत देश 31 मार्च, 2022 तक 2 करोड़ किफायती मकान बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन बाद में शहरों और गांवों की अलग-अलग आवश्यकताओं को देखते हुए स्कीम को पीएमएवाइ-शहरी और पीएमएवाइ-ग्रामीण दो भागों में बांट दिया गया। पीएमएवाइ-शहरी के तहत 1.12 करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

स्कीम की समीक्षा से पता चलता है कि शुरुआत के दो साल तो योजना की तैयारी में ही निकल गए थे। जबकि अंतिम दो सालों में कोरोना ने गड़बड़ कर दी। नतीजन अभी तक केवल लगभग 42 लाख मकान ही बन पाए हैं। जबकि 70 लाख में निर्माण कार्य शुरू हुआ है। हालांकि सरकार का पोर्टल इससे ज्यादा आंकड़े दिखा रहा है। लेकिन उसमें पुरानी एनआरयूएम स्कीम के आंकड़े जोड़ दिए गए हैं।
लेकिन स्कीम की वास्तविक प्रगति का अंदाजा पोर्टल में ही दिए गए वित्तीय आंकड़ों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है।

जिसके मुताबिक प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत निर्धारित कुल 7.35 लाख करोड़ रुपये के निवेश में से अब तक केवल 1.81 लाख करोड़ रुपये का निवेश मंजूर हुआ है। जबकि इसमें से मात्र 96,067 करोड़ की राशि वास्तव में जारी की गई है।

इस तरह स्पष्ट है कि सरकार के सामने अगले 9-10 महीनों में बाकी 70 लाख मकानों का निर्माण कार्य पूरा करने की असंभव सी चुनौती है। मार्च 2020 से जून, 2021 के बीच कोरोना ने स्कीम के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके मद्देनजर ऐसा नहीं लगता कि 31 मार्च, 2022 तक आधा लक्ष्य भी हासिल किया जा सकेगा। ऐसे में सरकार के समक्ष योजना की अवधि बढ़ाने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आता।

संसदीय समिति ने इस पर भारी चिंता जताई है। उसका कहना है कि कोरोना से कामकाज पर तो मार्च 2020 के बाद असर पड़ा है। जबकि उससे पहले के पांच सालों में भी केवल 38 फीसद काम हुआ था। यही नहीं, 36 राज्यों में से केवल 8 राज्यों ने स्कीम के तहत प्रस्तावित अन्य उप-परियोजनाओं में से एक मलिन बस्तियों के पुनर्विकास का काम हाथ में लिया है।

इसी तरह ईडब्ल्यूएस एवं अल्प आय वर्ग के लोगों को मकान सुधार/विस्तार के लिए रियायती कर्ज वाली एक अन्य उप योजना में भी कई राज्यों ने विशेष रुचि नहीं दिखाई है और ज्यादातर ऋण एमआइजी वालों को स्वीकृत कर दिए हैं।

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