मुरादाबाद: किसी को संगीत ने भक्ति से जोड़ा, कोई खानदानी परंपरा को बढ़ा रहा आगे

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

मुरादाबाद। मनुष्य के हर पल, हर सांस में संगीत है। अगर महसूस करें तो दैनिक जीवन में संगीत ही संगीत भरा है। कोयल की कूक, पानी की कलकल, हवा की सरसराहट, हर जगह वही तो है। बस जरूरत है तो इसे अनुभव करने की। यह न सरहदों में कैद होता है, न भाषाओं में बंधता …

मुरादाबाद। मनुष्य के हर पल, हर सांस में संगीत है। अगर महसूस करें तो दैनिक जीवन में संगीत ही संगीत भरा है। कोयल की कूक, पानी की कलकल, हवा की सरसराहट, हर जगह वही तो है। बस जरूरत है तो इसे अनुभव करने की। यह न सरहदों में कैद होता है, न भाषाओं में बंधता है। इसे हर मर्ज की दवा भी कहा जाता है।

यह दुखी से दुखी इंसान को भी प्रफुल्लित कर देता है। वक्त के साथ संगीत की दुनिया भी बदलने लगी है। लेकिन महानगर के कुछ फनकार आज भी भारतीय संगीत के मूल स्वरूप की धरोहर को सहेजे हुए हैं। कोई संगीत की बांह थाम भक्ति से रिश्ता जोड़ बैठा तो कोई खानदानी विरासत को आगे बढ़ाने में लगा है। महानगर के ऐसे ही दो संगीतज्ञों से विश्व संगीत दिवस पर बात की तो उन्होंने अपने जीवन के अनुभव अमृत विचार से साझा किए।

महानगर की गायत्री नगर कॉलोनी निवासी डॉ. हरीश त्रिपाठी के पुत्र कथा व्यास व्योम त्रिपाठी के जीवन पर संगीत का गहरा प्रभाव पड़ा। एक बार यात्रा शुरू हुई तो पीछे पलट कर नहीं देखा। सात सुरों की सरगम ने उनके कदम कब भक्ति पथ की ओर मोड़ दिए, उन्हें पता ही न चला। वह बताते हैं कि ढाई साल की उम्र में पहली बार किसी को ढोलक बजाता देख खुद भी ढोलक लेकर बैठ गए। उसके बाद उनकी अंगुलियों ने जो हरकत की, उसे देख उनके परिजन दंग रह गए।

सात बरस के होते-होते वह ढोलक तो अच्छी तरह बजाना सीख ही गए थे, अब उनकी अंगुलियां हारमोनियम के सुरों से भी खेलने लगीं थी। उनके अनुसार इस दौरान उन्होंने किसी से संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली। जितना भी कुछ सीखा सब ईश्वर की देन है। 2008 में बाकायदा संगीत प्रभाकर का डिप्लोमा कोर्स किया। बचपन से ही हारमोनियम बजाते-बजाते यकायक उनका रुझान भक्ति मार्ग की ओर हो गया। आठ साल की उम्र से भजन संध्या के कार्यक्रम शुरू कर दिए थे।

इसके बाद दादा स्वर्गीय बाला दत्त त्रिपाठी की प्रेरणा से भागवत कथा की ओर कदम बढ़ाए। वृंदावन के आचार्य गोरव कृष्ण शास्त्री से गुरू दीक्षा ली। उसके बाद नगर के रहने वाले पंडित रामप्रसाद मिश्र से भागवत कथा की शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने जिगर मंच पर कई कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी। साथ ही रामपुर आकाशवाणी केंद्र से भी उनके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। इसके अलावा वह दिल्ली देहरादून, हरिद्वार, वृंदावन, गाजियाबाद,अमरोहा, हलद्वानी, नैनीताल आदि स्थानों पर भी कार्यक्रम कर चुके हैं।

सहसवान घराने के संगीत को जीवंत रखने का प्रयास कर रहीं बाल सुंदरी
इसी क्रम में नाम आता है महानगर की शास्त्रीय गायिका बाल सुंदरी का। उन्होंने अपना जीवन संगीत को समर्पित कर दिया। मात्र तीन साल की उम्र से शुरू हुआ संगीत का सफर आज भी जारी है। उनका परिवार सहसवान घराने की संगीत परंपरा से जुड़ा रहा है। वह भी इसे आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही हैं।

बताती हैं कि पिता पुरुषोत्तम व्यास ने उन्हें संगीत की शिक्षा दी। थोड़ा बड़ी हुईं तो बड़े भाई मदन मोहन व्यास व ब्रज गोपाल व्यास से भी शास्त्रीय गायन की बारीकियां सीखीं। बचपन में उनके मुख से जब संगीत की स्वर लहरियां फूटतीं तो हर कोई बरबस भी मंत्रमुग्ध हो उठता। बताती हैं कि उन्होंने प्रताप सिंह गर्ल्स इंटर कॉलेज में संगीत शिक्षक के रूप में 41 वर्षों तक ड्यूटी की।

2009 में सेवानिवृत्त हो गई थीं। उनका कहना है कि वर्तमान में अधिकतर बच्चों का रुझान फूहड़ संगीत की तरफ हो गया है। शास्त्रीय संगीत से उनकी विमुखता चिंताजनक है। इसे देखते हुए वह युवाओं को संगीत की शिक्षा देकर सहसवान घराने की धरोहर को सहेजने का कार्य कर रही है।

संबंधित समाचार