कानून न होने से दिल्ली देश का सबसे बड़ा धर्मांतरण केंद्र
ज्ञानेंद्र सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। 9 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू होने की वजह से धर्मांतरण का सबसे बड़ा केंद्र दिल्ली बना हुआ है। रोजगार, शिक्षा एवं कारोबार के सिलसिले में देश के कोने-कोने से लोगों का दिल्ली में आवागमन रहता है। कई हिंदू संगठन इसका विरोध कर चुके हैं और दिल्ली सरकार से …
ज्ञानेंद्र सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। 9 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू होने की वजह से धर्मांतरण का सबसे बड़ा केंद्र दिल्ली बना हुआ है। रोजगार, शिक्षा एवं कारोबार के सिलसिले में देश के कोने-कोने से लोगों का दिल्ली में आवागमन रहता है। कई हिंदू संगठन इसका विरोध कर चुके हैं और दिल्ली सरकार से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर दिल्ली में भी धर्मांतरण विरोधी कानून लागू करने की मांग कर चुके हैं।
तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह 2015 में राष्ट्रीय धर्मांतरण निरोधक कानून की मांग भी कर चुके हैं और माना जा रहा है कि यदि राज्यसभा में भाजपा बहुमत में आ गई तो 1954 से लंबित भारतीय धर्मांतरण विनियमन पंजीकरण विधेयक संसद में पेश हो सकता है। यह विधेयक 1954 के बाद 1960 व 1979 में भी नहीं पारित हो सका था।
धर्मांतरण विरोधी कानून को कोई भी राज्य सरकार अपने यहां लागू कर सकती है। राज्यों में सबसे पहले यह कानून 1967 में उड़ीसा में लागू हुआ था वहां 1 से 2 वर्ष तक की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है। उसके बाद अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश सहित नौ राज्यों में इस समय यह कानून प्रभावी है। उत्तराखंड एवं उत्तर प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून पर रोक तो नहीं लगाई है मगर नोटिस जारी किया है।
जिन राज्यों में यह कानून लागू है वहां पर लालच देकर जबरन या धोखे से कोई भी धर्म परिवर्तन नहीं करवा सकता है। विवाह के मामलों में विवाह कराने वाले मौलवी के द्वारा 2 महीने पहले जिला प्रशासन को सूचित करना पड़ता है और एनओसी के बाद विवाह की अनुमति मिलती है।
राजस्थान में भी यह कानून 2008 में पारित हो गया था मगर कुछ तकनीकी कारणों से अभी लागू नहीं है। जबकि तमिलनाडु में यह कानून 2002 में पास तो हो गया था मगर ईसाइयों के प्रबल विरोध के चलते 2006 में इसे वापस ले लिया गया। यही वजह है कि ईसाई धर्मांतरण के सर्वाधिक मामले दक्षिण भारत में ही उजागर होते हैं। ठीक उसी तरह मुस्लिम धर्मांतरण के सर्वाधिक मामले दिल्ली में होते हैं।
दिल्ली में इस कानून को लागू करने की मांग तब उठी थी जब गत वर्ष दिसंबर में सरिता विहार स्थित एक मुस्लिम युवक ने हिंदू बनकर किराए पर मकान लिया और मकान मालिक की बेटी को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण करवाया। उसके बाद विश्व हिंदू परिषद सहित कई संगठनों ने इसका जोरदार विरोध किया था। मगर अभी तक केजरीवाल सरकार ने इस मसले पर कुछ भी नहीं किया है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण के जो मामले हुए उनका भी केंद्र बिंदु दिल्ली ही था और लगभग आधा दर्जन कार्यालय मुस्लिम क्षेत्रों में खुले हुए हैं जिसमें कई नौकरी व पढ़ाई के नाम पर काम करते हैं मगर असली एजेंडा धर्मांतरण का होता है। इन कार्यालयों का संचालन करने वाले लोगों की फंडिंग विदेशों से होती है। इनके एजेंट आसपास के राज्यों में फैले हुए हैं और वह अपना शिकार करके दिल्ली लाते हैं फिर उन पर धर्मांतरण की प्रक्रिया शुरू होती है। ज्यादातर मामले विवाह, लव जिहाद वाह लालच के नाम पर होते हैं।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है और उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण के मामले में दो अभियुक्त दिल्ली से पकड़े गए हैं और सबसे बड़ी खास बात यह है कि उसका विरोध सबसे पहले आम आदमी पार्टी के एक विधायक ने किया है और इस गिरफ्तारी को असंवैधानिक बताया है। उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही आम आदमी पार्टी ने पिछले वर्ष गाजियाबाद और हाथरस के मामलों में भी विरोध किया था। शायद यही वजह है कि धर्मांतरण का सबसे सुरक्षित केंद्र अब दिल्ली हो गया है।
