उप्र, उत्तराखंड समेत 16 राज्यों में चीनी मिलों पर 19,000 करोड़ बकाया

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संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। पूरे देश में चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 19 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का एरियर बकाया है। इसमें सबसे ज्यादा 8,995 करोड़ रुपये की देनदारी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर है। जबकि उत्तराखंड की मिलों पर भी किसानों की तकरीबन 596 करोड़ रुपये की रकम बाकी …

संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। पूरे देश में चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 19 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का एरियर बकाया है। इसमें सबसे ज्यादा 8,995 करोड़ रुपये की देनदारी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर है। जबकि उत्तराखंड की मिलों पर भी किसानों की तकरीबन 596 करोड़ रुपये की रकम बाकी है।

गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 के तहत चीनी मिलों को गन्ना खरीदने के 14 दिनों के भीतर किसान को उसका भुगतान करने का प्रावधान है। लेकिन व्यवहार में इस आदेश का यदा-कदा ही अनुपालन होता है। नतीजतन, गन्ने की खरीद के बाद किसानों को उसका भुगतान महीनों और वर्षों तक होता रहता है।देश में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक समेत 16 राज्यों में गन्ना उत्पादन होता है। इनमें उत्तर प्रदेश की मिलों पर अकेले 2020-21 का ही 7555 करोड़ रुपये का गन्ने का भुगतान बाकी है।

जबकि इससे पहले 2019-20 का 1406 करोड़ रुपये और उससे पूर्व के वर्षों का 34 करोड़ रुपये का बकाया अलग से है। उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड की मिलों पर गन्ना किसानों की 2020-21 की 416 करोड़ रुपये, 2018-19 की 105 करोड़ रुपये तथा 2017-18 व उससे उससे पहले की 75 करोड़ रुपये की रकम बकाया है। यूपी, उत्तराखंड के अलावा महाराष्ट्र की मिलों को लगभग 2200 करोड़ तथा कर्नाटक की मिलों को लगभग 3650 करोड़ रुपये का पुराना भुगतान किसानों को अदा करना है।

गन्ना मूल्य बकायों को लेकर चीनी उद्योग का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से देश में चीनी का उत्पादन मांग से ज्यादा हो रहा है। हर साल सौ लाख टन से ज्यादा चीनी अनबिकी रह जाती है। यही वजह है कि बाजार में चीनी के दाम बढ़ने के बजाय कम हो गए हैं। परिणामस्वरूप मिलों का मार्जिन घट गया है और वित्तीय स्थिति कमजोर हो गई है। इसके बावजूद किसानों को नियमित रूप से भुगतान करने का प्रयास किया जाता है। यदि ऐसा न होता तो हर साल गन्ने के बोआई रकबे में बढ़ोतरी नहीं होती।

वर्ष 2018-19 में देश में 105 लाख टन के कैरी ओवर स्टॉक के साथ चीनी का कुल उत्पादन 331.33 लाख टन रहा था। जबकि 2020-21 में कैरी ओवर स्टॉक 110 टन हो जाने से मिलों ने 310 लाख टन चीनी का ही उत्पादन करना बेहतर समझा। इसके बावजूद इन तीन सालों में गन्ने की खेती का रकबा 51.15 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 54.76 लाख हेक्टेयर हो गया है।

गन्ना नियंत्रण आदेश के मुताबिक गन्ने के उचित एवं लाभदायक मूल्य (एफआरपी) का निर्धारण केंद्र सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों तथा राज्य सरकारों से परामर्श के आधार पर करती है। कोई भी चीनी मिल एफआरपी से कम मूल्य पर गन्ने की खरीद नहीं कर सकती। सीएसीपी की ओर से एफआरपी की जो सिफारिश की जाती है उसमें रिकवरी रेट (प्रति क्विंटल गन्ने से प्राप्त चीनी की मात्रा) का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है।

फिलहाल पूरे देश के लिए बेसिक रिकवरी रेट 10 फीसद है। और इसके आधार पर 285 रुपये का एफआरपी रखा गया है। बेसिक रिकवरी रेट से अधिक प्रत्येक 0.1 फीसद और रिकवरी होने पर एफआरपी में 2.85 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हो जाती है। लेकिन देश में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा को मिलाकर 4 राज्य ऐसे हैं जो स्टेट एडवाइज प्राइस (एसएपी) के रूप में अपने किसानों के लिए केंद्र द्वारा निर्धारित न्यूनतम गन्ना मूल्य (एफआरपी) से अधिक मूल्य निर्धारित करते हैं।

इससे इन राज्यों में चीनी उत्पादकों पर दबाव और बढ़ गया है। उत्पादकों को अब केंद्र सरकार की एथनाल नीति से ही उम्मीद है, जिसके तहत शीरे व चीनी से निर्मित एथनॉल के मूल्य बढ़ाने के अलावा एथनॉल मिश्रित ऑटोमोबाइल ईंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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