लखीमपुर खीरी: पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही रास्ते से होकर गुजरते हैं हाथी
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी), अमृत विचार। नेपाल के जंगलों से निकलकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर जंगल के निकटवर्ती गांवों में हाथियों द्वारा किसानों को पहुंचायी जा रही हानि और उनके व्यवहार के बाबत वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ जितेंद्र शुक्ला ने बताया कि नेपाल में जंगल धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं जिसके कारण इन्हें भोजन की …
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी), अमृत विचार। नेपाल के जंगलों से निकलकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर जंगल के निकटवर्ती गांवों में हाथियों द्वारा किसानों को पहुंचायी जा रही हानि और उनके व्यवहार के बाबत वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ जितेंद्र शुक्ला ने बताया कि नेपाल में जंगल धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं जिसके कारण इन्हें भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ता है। इन्हें लगभग 300 किलोग्राम तक खाना व 160 लीटर तक पानी की आवश्यकता प्रतिदिन होती है। इसलिए अपने मूल निवास से निकलकर दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं।
उन्होंने बताया कि हाथी हजारों किलोमीटर तक की यात्रा करते हैं। यात्रा के समय रास्ते की पहचान के लिए रास्ते में पाई जाने वाली वनस्पतियों व जल के स्रोतों को याद कर लेते हैं फिर जब वापस लौटते हैं तो स्मरण शक्ति के आधार पर उन्हीं रास्तों से वापस लौट आते हैं। अपनी भूख और प्यास मिटाने के लिए भी यह रास्ते में पड़ने वाली फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
डाॅ. जितेंद्र शुक्ला ने बताया कि ये कानों में बनी विशेष ग्रंथियों के द्वारा अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करते हैं इसलिए अपने कान सदैव चलाते रहते हैं। यह अपनी सूंड से एक बार में 14 लीटर पानी तो खींच सकते हैं तथा इसी सूंड के द्वारा यह 19 किलोमीटर तक दूर स्थित पानी के स्रोत को सूँघ सकते हैं। इनके बारे में यह बात कही जाती है कि ये चींटी के काटने से मर जाते हैं।

इसका कारण यह है कि हाथी की सूंड के अंदर यदि चींटी, मक्खी, मच्छर काट ले तो कोमल होने के कारण उसमें घाव हो जाता है और इसी घाव के संक्रमण के कारण हाथी की मृत्यु तक हो जाती है। इनकी आंखों की देखने की क्षमता कम होती है। अधिक रोशनी में इन्हें न के बराबर दिखता है जबकि कम रोशनी में भी ये देख सकते हैं। इनकी आंखों से तरल द्रव निकलता रहता है जो इन की पुतली को नम रखता है। झुंड में शामिल हाथी की मृत्यु हो जाए तो ये सूंड ऊपर उठाकर विशेष आवाज निकालते हैं। यह अन्य हाथियों के लिए संकेत होता है कि कुछ अनिष्ट हो गया है।
उन्होंने बताया कि सभी हाथी इकट्ठे होकर मृत हाथी की देह में सूंड को स्पर्श कराकर उसके प्रति शोक प्रकट करते हैं। इनकी औसत आयु लगभग 50 से 70 वर्ष की होती है। 13 14 वर्ष में पहुंचने पर इनका यौवन आरंभ होता है इनका जन्म काल 22 महीने का होता है जो जीव धारियों में सबसे अधिक है। शरीर में नमक की कमी को पूरा करने के लिए ये नमकयुक्त भूमि को चाटते हैं अथवा बालू से स्नान करते हैं।
जंगल के अंदर लगाए जाएं कटहल, बड़हल, बांस
देश में हर दो साल में 367 वर्ग किलोमीटर जंगल समाप्त हो रहे हैं। जंगलों की कमी के फलस्वरुप न सिर्फ जंगली हाथियों का दायरा टूट रहा है बल्कि उनके भोजन की सामग्री में कमी आ रही है। इसके कारण इनकी संख्या में लगातार गिरावट भी देखी जा रही है। इन्होंने कहा कि हाथियों के भोजन का प्रबंध करने के लिए जंगल के अंदर कटहल, बड़हल, बाँस इत्यादि के पेड़ लगाए जाने चाहिए जिससे कि इनकी भोजन की आवश्यकता पूरी होती रहे और ये किसान की फसलों को क्षति न पहुंचाएं।
