गर्व: मुरादाबाद के लाल ने जमकर लिया था आतंकियों से लोहा, दुश्मनों के छुड़ाए छक्के

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Edited By Amrit Vichar
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मुरादाबाद, अमृत विचार। मुरादाबाद के इस लाल ने वक्त पड़ने पर पड़ोसी मुल्क की सेना के साथ ही आतंकियों से जमकर लोहा लिया था। अपनी बहादुरी और दिलेरी का परिचय देते हुए मौका मिलने पर कारगिल से लेकर कश्मीर तक दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे। अपने अदम्य साहस और बहादुरी से मुरादाबाद का लाल …

मुरादाबाद, अमृत विचार। मुरादाबाद के इस लाल ने वक्त पड़ने पर पड़ोसी मुल्क की सेना के साथ ही आतंकियों से जमकर लोहा लिया था। अपनी बहादुरी और दिलेरी का परिचय देते हुए मौका मिलने पर कारगिल से लेकर कश्मीर तक दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे। अपने अदम्य साहस और बहादुरी से मुरादाबाद का लाल दुश्मनों पर इस कदर टूटा कि उनको अपनी जान बचाना भारी पड़ गया।

आखिरकार कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए यह लाल देश के लिए शहीद हो गया। वक्त आया लाल की शहादत के नमन का तो शासन-प्रशासन से लेकर स्थानीय नेताओं ने खूब दम भरा। शहीद के परिजनों का हर मुश्किल में साथ देने का वादा करने के साथ ही उनके जीवन-यापन को सुगम बनाने के लिए तमाम घोषणाएं कर दी।

लेकिन वक्त के साथ एक घोषणाएं और दावे भी खोखले साबित निकले। सरकारी सिस्टम ने ऐसा मुंह मोड़ा कि अतिरिक्त मदद तो दूर की बात जो घोषणाएं की थी, वह भी आज तक पूरी नहीं की। सरकारी सिस्टम की यह अनदेखी कहीं न कहीं परिजनों को कुदेरने पर एक हूक बनकर उठती है।

हम बात कर रहे हैं छजलैट थाना क्षेत्र के ग्राम कुरी रवाना निवासी शहीद जयकुमार सिंह की। मुरादाबाद के लाल जयकुमार सिंह की भर्ती जाट रेजीमेंट में हुई थी। 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ तो जाट रेजीमेंट के जवानों को भी युद्ध में भेजा गया। जय कुमार सिंह भी अपनी बटालियन के साथ कारगिल युद्ध में शामिल हुए।

यहां पर कई दिनों तक उन्होंने दुश्मनों से लोहा लिया। एक-एककर उनके साथी जवान शहीद हो रहे थे वहीं जय कुमार बराबर दुश्मनों से लोहा लेते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे। कई दिनों तक दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के बाद जब भारतीय जवानों ने युद्ध जीतकर जश्न मनाया तो उस खास पल के भागीदार जय कुमार सिंह भी बने थे।

दो मार्च वर्ष 2000 को कश्मीर में हुए थे शहीद
अपनी बहादुरी और वीरता के दम पर जय कुमार सिंह ने अपनी बटालियन में खास जगह बना ली थी। बताते हैं कि इस युद्ध के बाद कश्मीर में फिर आतंकी गतिविधियां बढ़ी तो बटालियन संग जय कुमार सिंह की ड्यूटी कश्मीर में लगा दी गई। दो मार्च 2000 को कश्मीर के बादामपुरा में फिर आतंकियों से मुठभेड़ हो गई। यहां पर भी उन्होंने अपनी वीरता दिखाई लेकिन बाद में शहीद हो गए।

पांच मार्च को उनका शव पैतृक गांव आया तो परिजनों में कोहराम मच गया। इसके बाद उनकी शहादत को नमन करने वालों का तांता लगना शुरू हो गया। शासन-प्रशासन से लेकर स्थानीय नेता भी शहीद को नमन करने पहुंचे। सभी ने तमाम दावे किए, हर मुश्किल परिस्थितियों में शहीद के परिजनों का साथ देने का वादा किया गया।

वादे तमाम किए लेकिन नहीं की मदद
शहादत को नमन करने पहुंचे अफसरों के अलावा स्थानीय नेताओं ने शहीद के परिजनों से तमाम वादे किए। हर मुश्किल वक्त में साथ खड़े होने की बात कही। लेकिन वक्त के साथ ही सरकारी मशीनरी ने भी शहीद के परिजनों से मुंह मोड़ लिया। हालात यह है कि अधिकतर वादे आज तक पूरे नहीं हुए हैं। कारगिल दिवस के मौके पर मौजूदा समय में सिविल लाइंस कोतवाली क्षेत्र के हिमगिरि कालोनी में रहने वाली शहीद की पत्नी सुनीता देवी से बात की तो उनका दर्द छलक उठा।

उन्होंने बताया कि उस वक्त पेट्रोल पंप देने की घोषणा की गई थी। इसके अलावा लंबे-चौड़े वादे किए गए थे। काफी समय तक पेट्रोल पंप को लेकर जब किसी ने सुध नहीं ली तो उन्होंने स्थानीय अफसरों से संपर्क किया। जिस पर अफसरों ने यह कहकर पेट्रोल पंप देने से इंकार कर दिया कि जय कुमार सिंह कारगिल युद्ध में नहीं बल्कि एक साल बाद आतंकियों से हुई मुठभेड़ में शहीद हुए थे। हालांकि बाद में उनको गांव में सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान आवंटित कर दी गई लेकिन कुछ साल पहले गांव की राजनीति के कारण उन्होंने दुकान छोड़ दी।

खुद के पैसों से बनवाई शहीद पति की स्मारक
सुनीता देवी का कहना है कि जब पति शहीद हुए थे तो उनका बड़ा बेटा रविंद्र सिंह सात साल व छोटा बेटा विकास दो साल का था। वह खुद पढ़ी-लिखी नहीं थी, जिस कारण किसी को मृतक आश्रित में नौकरी नहीं मिल सकी। बोली, सहायता के नाम पर उनको केवल वही मिला जो उनके पति का हक था। किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिली।

उन्होंने बताया कि सरकार ने उनकी कोई आर्थिक मद्द नहीं की, बल्कि तकलीफ तब हुई जब उन्होंने अपने शहीद पति की गांव में स्मारक तक खुद उन्हीं के पैसों से बनवाई। जबकि उस वक्त कई बार चक्कर काटने के बाद तत्तकालीन डीएम ने यह आश्वासन दिया था कि अभी आप अपने पास से स्मारक बनवा लें, बाद में फंड जारी कर दिया जाएगा। हालांकि अभी तक फंड भी जारी नहीं हो सका है। उन्होंने कहा कि तसल्ली इस बात की है कि मौजूदा समय में शहीद का बड़ा बेटा रविंद्र सिंह यूपी पुलिस में कंप्युटर आपरेटर के पद पर है और छोटा बेटा विकास बेहतर नौकरी के लिए कोचिंग कर रहा है।

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