बरेली: खुशी के आंसुओं से लोगों ने किया आजाद हिंदुस्तान का स्वागत

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शिवांग पांडेय, बरेली। 14 अगस्त 1947 की आधी रात को ही आजाद भारत का ऐलान हो चुका था। बस इंतजार था तो आजादी की पहली सुबह के जश्न का। वह रात भी बेहद कठिन थी क्योंकि खुशी में उस रात कोई नींद भर सो भी नहीं पाया। सुबह हुई और रेडियो पर आजाद भारत की …

शिवांग पांडेय, बरेली। 14 अगस्त 1947 की आधी रात को ही आजाद भारत का ऐलान हो चुका था। बस इंतजार था तो आजादी की पहली सुबह के जश्न का। वह रात भी बेहद कठिन थी क्योंकि खुशी में उस रात कोई नींद भर सो भी नहीं पाया। सुबह हुई और रेडियो पर आजाद भारत की घोषणा होते ही जश्न का माहौल हो गया। यह निराली सुबह 15 अगस्त सन 1947 की थी। शहर के बीआई बाजार निवासी तिलक राज ढींगरा आजादी की उस सुबह की यादों को ताजा करते हुए गौरवान्वित महसूस करते हैं।

देश की आजादी की 75वीं जयंती मनाई जा रही है। लोग स्वाधीनता के पर्व को पूरे जोश के साथ मनाने की तैयारी कर चुके हैं। तिलक राज ढींगरा उन तमाम बुजुर्गों में से एक हैं जिन्होंने आजादी का पहला दिन देखा था। उनके जेहन में उस दिन की एक-एक बात ऐसी ताजा है जैसे मानो यह सब दो चार दिन पहले की बात हो। वे बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ तो खुशी के आंसू निकल पड़े थे।

उनका जन्म 7 मार्च 1935 में पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खां में हुआ था। यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि उनके पिता की एक जनरल मर्चेंट की एक दुकान थी। जिससे पूरे परिवार का पालन पोषण चलता था। 1947 में ही विभाजन से कुछ महीने पहले ही डेरा इस्माइल खां में दंगे की आग भड़कने लगी। खतरे को भांपते हुए उनके पिता सपरिवार डेरा इस्माइल खां छोड़कर अमृतसर जाने के लिए निकल पड़े। अमृतसर जाने के बाद उन्होंने देखा कि अमृतसर व लाहौर के बीच चलने वाली ट्रेनों में साम्प्रदायिकता की आड़ में नरसंहार होने लगा।

रूआंसी आंखों से याद करते हुए उन्होंने बताया कि ट्रेनों में भीषण नरसंहार देखने के बाद पिता जी अपने सेना के दोस्त के कहने पर बरेली चले आए। जिसके बाद हमने एक नई सुबह आजादी की सांस ली, लेकिन साथ में गुलामी के जख्मों का अहसास भी था। लोगों की आंखों से आंसू निकल पड़े थे। उन्होंने बताया कि वह खुद भी अपने मित्रों के साथ शहर में हो रहे जश्न के आयोजनों में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। उस दिन घर आने का मन ही नहीं हो रहा था।

हालांकि देर रात तक घर लौट आए लेकिन घर में किसी ने कुछ नहीं कहा। उसकी भी वजह थी कि घर के पुरुष मोहल्ले के लोगों के साथ रात में आजादी की गाथा की चर्चा कर रहे थे। वर्तमान परिवेश की बात करते हुए उन्होंने बताया कि समझ नहीं आ रहा कि जिस आजादी को पाने के लिए हिदू और मुसलमान दोनों ने मिलकर संघर्ष किया, आज वह कैसे अलग अलग हो गए। फिलहाल बरेली पाकिस्तान बंटवारे में हुए दंगों से बहुत दूर था, यहां हंसी खुशी का माहौल था।

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