गर्भस्थ शिशु का भी हो सकता है उपचार
बरेली, अमृत विचार। गर्भस्थ शिशु को 90 फीसद तक जन्मजात बीमारियों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। आजकल ज्यादातर गर्भ में पल रहे शिशुओं के दिल में छेद, डाउन सिंड्रोम, हीमोफीलिया, सहित अनेक प्रकार के जन्मजात रोगों की समस्याएं देखी जा रही हैं। देश भर में दो से तीन फीसद तक बर्थ डिफेक्टस होता है। …
बरेली, अमृत विचार। गर्भस्थ शिशु को 90 फीसद तक जन्मजात बीमारियों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। आजकल ज्यादातर गर्भ में पल रहे शिशुओं के दिल में छेद, डाउन सिंड्रोम, हीमोफीलिया, सहित अनेक प्रकार के जन्मजात रोगों की समस्याएं देखी जा रही हैं। देश भर में दो से तीन फीसद तक बर्थ डिफेक्टस होता है। इसमें बच्चा मानसिक रूप से कमजोर हो सकता है और उसका दिल खराब हो जाता है। ऐसे बच्चों को जीवनभर परेशानी का सामना करना पड़ता है लेकिन समय रहते गर्भ में पल रहे शिशुओं को पर्याप्त उपचार मिल जाए तो इस तरह की बीमारियों को ठीक भी किया जा सकता है।
बरेली ऑब्स्टेट्रिक गाइनाकोलॉजिकल सोसायटी की ओर से स्टेशन रोड स्थित एक होटल में आयोजित प्रेसवार्ता में पहुंचीं स्त्री रोग विशेषज्ञों ने यह जानकारी दी। इस दौरान सोसायटी अध्यक्ष डा. प्रीति वैश, नीरा अग्रवाल, डा. भारती सरन, डा. प्रीती अग्रवाल, दरखशां अब्बास, डा. लतिका अग्रवाल, डा. लता अग्रवाल, डा. कोमल कक्कड़, डा. मृदुला शर्मा समेत काफी संख्या में चिकित्सक उपस्थित रहे।
मददगार साबित हो रही कार्डियोट्रोपोग्राफी
मुजफ्फरनगर मेडिकल कॉलेज की गाइनोकोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष डा. भारती माहेश्वरी ने बताया कि इस प्रकार की समस्याओं से बचने के लिए मेडिकल टेस्ट प्रोटोकॉल निर्धारित है जो गर्भवती महिलाओं को मानना चाहिए । ऐसे गंभीर मामलों में बीमारी के कारण कई बार महिलाओं को एबार्ट भी कराने की सलाह भी दी जाती है। बताया कि समय पर चिकित्सकीय जांच के माध्यम से डिलीवरी से पूर्व ही बीमारी पता लग सकती है। इसके अलावा डिलीवरी के दौरान कॉर्डियोट्रोकोग्राफी की मदद से अगर गर्भस्थ की धड़कन खराब हो तो वह भी पता लग सकती है।
तीसरे और पांचवें महीनों में अल्ट्रासाउंड की जांच जरूरी
मेरठ से पहुंची सोसायटी की सचिव डा. प्रियंका गर्ग ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान जरूरी है कि महिलाएं तीसरे और पांचवें माह में स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेकर अल्ट्रासांउड जांच कराएं। ताकि बच्चे की दिशा, दिल की धड़कन, सहित गर्भस्थ के शारीरिक विकास के बारे में पता चल सके। फलस्वरूप गर्भस्थ में किसी प्रकार के रोग की संभावना होने पर उसका उपचार शुरू किया जा सके। बताया कि इसके अलावा कुछ अन्य जांच कराने की भी आवश्यकता होती है। ऐसे में लापरवाही करने पर दोनों के लिए घातक हो सकता है।
इस दौरान लापरवाही पड़ सकती है गर्भवती पर भारी
सोसायटी की बरेली शाखा की सचिव डा. प्रगति अग्रवाल ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान लापरवाही के कारण इसका सीधा असर गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। फलस्वरूप इस तरह की बीमारियों के होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में महिलाओं को समय – समय पर जांच कराने के अलाावा चिकित्सकीय परामर्श भी लेते रहने की सलाह भी दी जा रही है।
