मुरादाबाद : मोबाइल के युग में गुम हुई संदेश का जरिया ‘चिट्ठी’
विनोद श्रीवास्तव/मुरादाबाद, अमृत विचार। जाते हो परदेस पिया, कबूतर जा-जा; ‘चिट्ठी आई है’ ‘डाकिया डाक लाया’ गीतों के अहम किरदार रहा डाकिया आज तकनीक के दौर में गुमनाम हो चला है। अब न तो डाकिया के हाथों पिया का संदेश आता है न प्रिय की खैरियत। मोबाइल इंटरनेट के युग में व्हाट्सएप, फेसबुक व ट्विटर …
विनोद श्रीवास्तव/मुरादाबाद, अमृत विचार। जाते हो परदेस पिया, कबूतर जा-जा; ‘चिट्ठी आई है’ ‘डाकिया डाक लाया’ गीतों के अहम किरदार रहा डाकिया आज तकनीक के दौर में गुमनाम हो चला है। अब न तो डाकिया के हाथों पिया का संदेश आता है न प्रिय की खैरियत। मोबाइल इंटरनेट के युग में व्हाट्सएप, फेसबुक व ट्विटर ने इस किरदार को मानो बीते युग का बना दिया है। समय चक्र के साथ डाकिए के प्रतीक्षा करने वाली दोपहरी भी विदा हो गई है।
तीन चार दशक पहले डाकघर व डाकिया जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। डाकिया के आने से घर में मंगल धुन तो कभी शोक के संदेश मिलते थे। प्रिये की खैरियत व बापू की चिट्ठी का भी बच्चों को बेसब्री से इंतजार रहता था। लेकिन तकनीक के दौर में आज संदेशों के आदान प्रदान का माध्यम मोबाइल, इंटरनेट पर ह्वाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर ने लिया है। पलक झपकते ही संदेशों के साथ वीडियो काल से यादें जीवंत कर ली जाती हैं।
डाकिया भी अब न तो संदेश के इंतजार का जरिया रह गया और न फिल्मकारों के लिए महत्वपूर्ण किरदार। चिट्ठी न कोई संदेश, चिट्ठी आई है जैसे गीतों ने वर्षों तक लोगों के दिलों पर राज कर डाकिए की अहमियत का अहसास कराया।
अमृत महोत्सव में डाक सेवाओं को किया जा रहा समृद्ध
आजादी के अमृत महोत्सव के आयोजन के क्रम में इन दिनों डाक सेवाओं को समृद्ध करने का काम किया जा रहा है। राष्ट्रीय डाक सप्ताह मनाकर लोगों को डाकघर की सेवाओं की अहमियत बताई जा रही है। मुरादाबाद सर्किल में आज भी डाक सेवाएं प्रधान डाकघर, दो मुख्य डाकघर संभल, चंदौसी, 75 डाकघर व 405 उप डाकघर के माध्यम से डाक योजनाओं का लाभ लोगों को दिलाया रहा है।
लेटर बाक्स नदारद, डाकिए भी कम
संदेशों के आदान प्रदान के हाईटेक तरीके ने डाकिया के साथ ही लेटर बाक्स को भी परिचय का मोहताज कर दिया है। नहीं तो हर अहम सड़कों व गली मोहल्लों में लाल डिब्बा दिखते ही लोगों को अपनों के संदेश की चिंता सताने लगती थी। लेटर बाक्स से लोगों की भावनाएं जुड़ी थीं। खाकी परिधान में जब डाकिया साइकिल की घंटी बजाते हुए दरवाजे पर दस्तक देता था लोग बेबस ही लेटर बाक्स और डाकखाने को याद कर लिया करते थे। आज के समय में मुरादाबाद सर्किल में 197 डाकिया के सापेक्ष 83 की तैनाती है। वैकल्पिक व्यवस्था से डाक बांटने का काम चल रहा है।
डाकखाना शब्द नहीं, पूरी संस्कृति है। संचार की सबसे प्रारंभिक अवस्था से मनुष्य का साथ देने वाली चिट्ठी संस्कृति में इतनी रची-बसी रही कि उस पर गीत लिखे गए। यह सही है कि आज तकनीक के दौर में डाकिया की प्रासंगिकता कम हुई है। लेकिन खत्म नहीं। आजादी के अमृत महोत्सव के क्रम में डाक सेवाओं को समृद्ध किया जा रहा है। वीर सिंह, प्रवर अधीक्षक डाक, मुरादाबाद मंडल
