ऐतिहासिक विरासत को समेटे हुए है रायबरेली की कलम-दवात पूजा
रायबरेली। जिले में हर साल दीपावली के बाद संपन्न होने वाली कलम-दवात की पूजा और चित्रगुप्त शोभा यात्रा का अनूठा रोचक इतिहास है। दीपावली के बाद रायबरेली में संपन्न हुई कलम-दवात पूजा और शोभायात्रा का सिलसिला तो साल दर साल जारी है। लेकिन मौजूदा पीढ़ी इस परंपरा के इतिहास से परिचित नहीं हैं। दरअसल, यह …
रायबरेली। जिले में हर साल दीपावली के बाद संपन्न होने वाली कलम-दवात की पूजा और चित्रगुप्त शोभा यात्रा का अनूठा रोचक इतिहास है। दीपावली के बाद रायबरेली में संपन्न हुई कलम-दवात पूजा और शोभायात्रा का सिलसिला तो साल दर साल जारी है। लेकिन मौजूदा पीढ़ी इस परंपरा के इतिहास से परिचित नहीं हैं।
दरअसल, यह परंपरा इस शहर के इतिहास से भी जुड़ा है। बता दें कि रायबरेली के ऐतिहासिक महत्व के जानकार व सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक अशोक कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि भरौली से बरेली और फिर रायबरेली में तब्दील हुए इस शहर का इतिहास बहुत पुराना है। यह नगर दो भाइयों, राजा डल और राजा बल ने बसाया था। गंगा नदी के किनारे बसे डलमऊ का नामकरण राजा डल के नाम पर हुआ। जबकि भरौली से बरेली रूपांतरित नाम राजा बल के नाम पर आया।
उन्होंने बताया कि ब्रिटिश काल में जमींदारों और तालुकेदारों की बहुतायत के कारण बरेली के नाम में ‘राय’ शब्द जुड़ने के बाद यह रायबरेली हो गया। वहीं, कायस्थ बहुल इलाका होने के कारण यहां कायस्थों के आराध्य देव चित्रगुप्त का पूजन बड़ी धूमधाम से संपन्न होता है। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुट बिहारी श्रीवास्तव बताते हैं कि हर साल दीपावाली के बाद स्थानीय लोग राय साहब की कोठी के सामने स्थित चित्रगुप्त मंदिर से भव्य शोभा यात्रा निकालते हैं। पत्रकार विवेक श्रीवास्तव कहते हैं कि सर्वसमाज की भागीदारी वाली शोभायात्रा में नौकरशाह, राजनेता और समाजसेवी भी शामिल होते हैं। इससे जुड़ी एक परंपरा के मुताबिक दीपावली के बाद 24 घंटे तक कलम का उपयोग नहीं किया जाता है।
पहले बिहार बाद झारखंड में जज रह चुकी राधा श्रीवास्तव कहती है। इसके पीछे पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान राम के राजतिलक का आमंत्रण नहीं मिलने से नाराज प्राणियों का लेखा-जोखा रख ईश्वरीय विधान से न्याय करने वाले भगवान चित्रगुप्त ने अपनी कलम रख दी थी। उस समय पड़वा काल शुरू हो चुका था। तभी से परवा के दिन कायस्थ समाज कलम का प्रयोग नहीं कर हैं। उन्होंने बताया कि इस परंपरा का आज भी पालन जारी रखते हुये यमद्वतिया के दिन कलम-दवात के पूजन के बाद ही इसका उपयोग शुरु किया जाता है। इस संबंध में सेवानिवृत्त जिला जज कृष्ण मुरारी लाल श्रीवास्तव एक रोचक किवदंती बताते हैं कि भगवान राम, जब रावण को मार कर अयोध्या लौटे तब उनके खडाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राजकाज चला रहे भरत ने गुरु वशिष्ठ को राम के राज तिलक समारोह के लिए सभी देवी देवताओं को आमंत्रित करने को कहा। गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राजतिलक की तैयारी शुरू कर दी।
समारोह में जब सभी अतिथि आ गए तब राम ने भरत से भगवान चित्रगुप्त के नहीं आने की वजह पूछी। तब पता चला कि गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं था। भगवान चित्रगुप्त ने गुरु वशिष्ठ की इस भूल से नाराज होकर यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने वाली कलम को एक किनारे रख दिया। जिससे प्राणियों को उनके कर्मों का फल देने का क्रम अवरुद्ध हो गयाI जब सभी देवी-देवता राम के राजतिलक समारोह से लौटे तो पाया कि स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे। तब सभी ने इस भूल के लिए भगवान चित्रगुप्त से क्षमायाचना की। इसपर उन्होंने लगभग चार पहर अर्थात 24 घंटे बाद पुन: कलम दवात की पूजा करने के पश्चात उसको उठा अपना कार्य आरम्भ किया। तभी से दीपावली की पूजा के पश्चात कायस्थ लोग कलम को रख देते हैं और यमद्वतिया के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम-दवात पूजन करके ही कलम का उपयोग करते है।
