मथुरा: संत गीतानन्द की करुणा भाव के अटल भी थे कायल, जानें क्यों…
मथुरा। “ प्रभु तुम हरौ जनन की पीर” को आराधना का मूल मंत्र मानकर ताउम्र जनहित के कार्यों को तल्लीन रहे संत गीतानन्द महराज की प्रतिभा और करुणा भाव के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी मुरीद बन गए थे। दरअसल, कारगिल युद्ध के बाद प्रधानमंत्री रक्षा कोष में जमा करने के लिए संत गीतानंद …
मथुरा। “ प्रभु तुम हरौ जनन की पीर” को आराधना का मूल मंत्र मानकर ताउम्र जनहित के कार्यों को तल्लीन रहे संत गीतानन्द महराज की प्रतिभा और करुणा भाव के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी मुरीद बन गए थे। दरअसल, कारगिल युद्ध के बाद प्रधानमंत्री रक्षा कोष में जमा करने के लिए संत गीतानंद ने 11 लाख रुपये की थैली पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी तो उनके मुख से सहसा निकल पड़ा “ यदि अन्य संत इसी भावना को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करें तो भारत अपने पुराने गौरव को प्राप्त कर सकता है।
इस प्रतिक्रिया पर अहंकार से कोसों दूर इस महान संत ने यह कहकर वाजपेयी को और आश्चर्यचकित कर दिया था कि इसमें उनका कुछ भी योगदान नही है। उन्होंने तो वहीं काम किया है जो एक पोस्टमैन करता है। यह धनराशि उनके शिष्यों की है। जिसे उन्होने प्रधानमंत्री रक्षा कोष को दिया है। उनका सिद्धान्त था कि दान इस प्रकार दिया जाना चाहिए कि दाहिने हाथ से दिये गए दान का पता बांए हाथ को भी न चल सके। मानव कल्याण को अपना परम धर्म मानने वाले संत ने अपने जीवन की अंतिम सांस तक समाज के प्रत्येक वर्ग की मदद करने का प्रयास किया था।
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उत्तर भारत के वे ऐसे महान संत थे जेा घट घट में भगवान के दर्शन करते थे तथा जिनका कार्य क्षेत्र उनके की ओर से देश के विभिन्न भागों में स्थापित किये गए आश्रमों के साथ साथ आश्रम के बाहर भी था। गीता आश्रम वृन्दावन के प्रमुख व महामंडलेश्वर स्वामी डॉ अवशेषानन्द ने बताया कि ब्रम्हलीन संत के 17वें निकुंज उत्सव गीता आश्रम में एक कार्यक्रम 21 नवम्बर को मनाया जा रहा है। जिसमें देश के जाने माने संत, विद्वान, हाईकोर्ट के जस्टिस, अधिकारी, समाजसेवी, शिक्षाविद भाग ले रहे हैं। इस अवसर पर भगवत सेवा में लीन साधुओं को ऊनी वस्त्रों व कंबल आदि का वितरण किया जाएगा वहीं साधन विहीन लोगों को भी यह सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
वहीं, वृन्दावन की पावन धरती पर चैतन्य महाप्रभु, बल्लभाचार्य, रूप गोस्वामी, जीव गोस्वामी, गोपाल भट्ट, जैसे संतों ने यदि धर्म की घ्वजा फहराई और श्यामाश्याम की लीलाओं के गूढ़ रहस्य को समाज के कोने कोने तक पहुंचाया तो 20वीं सदी में देवरहा बाबा, श्रीपाद बाबा, आनन्दमयी मां,स्वामी अखण्डानन्द, स्वामी वामदेव, नीम करौली बाबा, जैसे संतों ने सनातन धर्म पर आए संकट से समाज को निकाल कर एक दिशा दी। स्वामी गीतानन्द महराज ने इससे अलग हट कर गीता के रहस्य को मानव जीवन में उतारने के मूलमंत्र को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उसके कायल हो गये थे। इसके अलावा कहा जाता है कि संत भगवत शक्ति का एक स्वरूप होता है। जैसे जल का सहज स्वभाव हर व्यक्ति को शीतलता देकर उसकी तृष्णा को बुझाना होता है उसी प्रकार संतों का स्वभाव दुखी और संतृप्त जीवों पर करूणा कर उन्हें कल्याणकारी मार्ग की ओर अग्रसर करने का होता है। ब्रम्हलीन संत गीतानन्द महराज इन्हीं विशेषताओं के कारण अपने शिष्यों के प्रेरणा के श्रोत बन गए।
