देश पर संभावित जैविक या रासायनिक हमलों को रोकने में सक्षम डीआरडीओ: डॉ मेघवंशी

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झांसी। देश की रक्षा अनुसंधान कार्य से जुड़ी संस्था रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की ग्वालियर स्थित प्रयोगशाला रक्षा अनुसंधान एवं विकास स्थापना (डीआरडीई) का काम देश पर किसी संभावित रासायनिक या जैविक हमले से सुरक्षा प्रदान करना है। हाल ही में यहां हाथी ग्राउंड में आयोजित रक्षा प्रदर्शनी में डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं …

झांसी। देश की रक्षा अनुसंधान कार्य से जुड़ी संस्था रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की ग्वालियर स्थित प्रयोगशाला रक्षा अनुसंधान एवं विकास स्थापना (डीआरडीई) का काम देश पर किसी संभावित रासायनिक या जैविक हमले से सुरक्षा प्रदान करना है। हाल ही में यहां हाथी ग्राउंड में आयोजित रक्षा प्रदर्शनी में डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं के उत्पादों के साथ रक्षा अनुसंधान और विकास स्थापना (डीआरडीई) ग्वालियर की कैम-बायोडिफेंस तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया।

डीआरडीई के वैज्ञानिक डॉ एम के मेघवंशी ने मंगलवार को बताया कि डीआरडीओ की 50 से अधिक प्रयोगशालाओं में एक प्रयोगशाला समूह ऐसा भी है जिसे लाइफ साइंसेज क्लस्टर के नाम से जाना जाता है। इसी क्लस्टर में आने वाली एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोगशाला है“ डीआरडीई”। यूं तो डीआरडीओ सैनिकों के लिए आधुनिक हथियारों और युद्ध में काम आने वाले दूसरे साजोसामान से जुड़ी विकसित करने का काम मुख्य रूप से करता ही है और डीआरडीई का मुख्य काम जैविक एवं रासायनिक हथियारों की पहचान, उनसे बचाव एवं वातावरण शुद्धिकरण जैसे क्षेत्र से संबंधित तकनीक विकसित करना है।

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साथ ही इसका कार्य देश पर होने वाले संभावित जैविक एवं रासायनिक हमलों से सुरक्षित रखना है। इसके अलावा सैनिकों की मानवीय जरूरतों को पूरा करने वाले सामान की तकनीक भी विकसित करता है। हाल ही में 17 से 19 तक आयोजित हाथी ग्राउण्ड प्रदर्शनी में डीआरडीई की ही अन्य महत्वपूर्ण टैक्नोलॉजी का भी प्रदर्शन किया गया। जिसे बायोडायजस्टर के नाम से जाना जाता है। डॉ मेघवंशी ने बताया कि यह मानव अपशिष्ट के उपचार हेतु प्रयोग में लाई जाती है।

अत्यधिक ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों जैसे-लेह, लद्दाख व सियाचिन जैसे स्थानों पर तैनात सैन्य बलों के उपयोग के लिए विकसित इस तकनीक को आज भारतीय रेलवे में भी मानव अपशिष्ट के ऑन बोर्ड ट्रीटमेंट के प्रयोग में लाया जा रहा है। डीआरडीओ की इस तकनीक पर आधारित बायोटॉयलेट के उपयोग से रेल परिवहन तंत्र को स्वच्छ बनाकर केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत अभियान में मदद मिली है। वर्तमान में डीआरडीई इस तकनीक के अधिक बेहतर रूप के अनुसंधान एवं विकास में लगी हुई है।

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