चुनावी मुद्दा : अमरोहा में ढाई दशक का सूखा खत्म करने के लिए बेचैन भाजपा
मनोज पंवार/अमृत विचार। भाजपा ढाई दशक का सूखा खत्म करने के लिए बेचैन है। लेकिन, उसे हर बार निराशा ही हाथ लगती है। 90 के दशक में जरूर दो बार पार्टी के विधायक रहे, उसके बाद चुनावी जमीन खिसकती चली गई। जब देश और प्रदेश में मोदी का नारा पूरे जोश पर था तब भी …
मनोज पंवार/अमृत विचार। भाजपा ढाई दशक का सूखा खत्म करने के लिए बेचैन है। लेकिन, उसे हर बार निराशा ही हाथ लगती है। 90 के दशक में जरूर दो बार पार्टी के विधायक रहे, उसके बाद चुनावी जमीन खिसकती चली गई। जब देश और प्रदेश में मोदी का नारा पूरे जोश पर था तब भी यहां पर भाजपा को हार ही मिली। हालांकि पार्टी इस सीट पर अपने कब्जे को लेकर बेताब है। लगातार चार बार से इस सीट पर सपा का कब्जा है।
मिशन 2022 के लिए चुनावी जंग शुरू हो गई है। सभी दल अपने-अपने स्तर से पूरी मेहनत कर रहे हैं। अगर हम जनपद की बात करें तो भाजपा के लिए सबसे ज्यादा खासी सीट अमरोहा रहती है। लेकिन, हर बार कमल खिलने से रह जाता है। पार्टी का पूरा जोर इस सीट पर रहता है और हो भी क्यों न, पिछले चार बार से सपा का ही उम्मीदवार इस सीट पर जीत दर्ज कराता चला आ रहा है। जिस दौर में भाजपा ऐसी जगह पर जीत गई थी, जहां पर सोचा भी नहीं गया था फिर भी अमरोहा की सीट पर जीत दर्ज नहीं करा सकी थी।
पहले इस क्षेत्र को मिनी छपरौली भी कहा जाता था, क्योंकि इस सीट का कुछ हिस्सा कांठ विधानसभा क्षेत्र में आता था और अधिकांश यहां पर जाट बहुल्य क्षेत्र माना जाता था। परिसीमन के बाद विधानसभा सीट पर बदलाव हो गया। अब जनपद में नौगांवा सादात, मंडी धनौरा, अमरोहा और हसनपुर विधानसभा हैं। लेकिन, इन सीटों पर अमरोहा की सीट ज्यादा महत्व रखती है। वर्ष 1991 में प्रताप सिंह सैनी और वर्ष 1996 में मंगल सिंह सैनी ने ही यहां पर कमल खिलाया था। उसके बाद से चुनावी जमीन खिसकती चली गई। अगर जातिगत आंकड़ों पर भी गौर किया जाए तो मुस्लिम वोटर सबसे ज्यादा हैं।
नहीं मिली जलभराव से राहत
अमरोहा विधानसभा सीट पर विधायक चाहे कोई भी रहा हो। लेकिन, आज तक यहां के लोगों को जलभराव से राहत नहीं मिली है। बरसात के दिनों में शहर में घुटनों-घुटनों पानी भर जाता है। पानी निकासी के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन, आज तक समस्या का हल नहीं निकल सका। चुनाव में भी अमरोहा के जलभराव का मुद्दा खास रहता है। हर कोई उम्मीदवार यह ही भरोसा दिलाता है कि जलभराव की समस्या से निजात दिलाई जाएगी। इसके अलावा यहां पर न ही कोई सरकारी विश्वविद्यालय है, न ही मेडिकल कॉलेज है। हां, लोगों को खेलने के लिए स्टेडियम जरूर मिला है।

