कानपुर: सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी करने वाले गैंग को क्राइम ब्रांच ने दबोचा

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कानपुर। सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी करने वाले बड़े गैंग को क्राइम ब्रांच ने दबोचा है। फर्जी कॉल सेंटर, फर्जी नियुक्ति पत्र समेत मोहरे और पत्र भी बरामद हुए है। अब तक दर्जनों लोगों को इन लोगों ने चूना लगाया था। नेवी, एयरफोर्स, आर्मी, डिफेंस सेक्टर, रेलवे, टीचर समेत कई सरकारी पदों पर …

कानपुर। सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी करने वाले बड़े गैंग को क्राइम ब्रांच ने दबोचा है। फर्जी कॉल सेंटर, फर्जी नियुक्ति पत्र समेत मोहरे और पत्र भी बरामद हुए है। अब तक दर्जनों लोगों को इन लोगों ने चूना लगाया था। नेवी, एयरफोर्स, आर्मी, डिफेंस सेक्टर, रेलवे, टीचर समेत कई सरकारी पदों पर नौकरी लगवाने का अलग रेट तय होता था।

इस पूरे खेल में ओएफसी में कार्यरत कुछ कर्मचारी भी शामिल पाये गये है।  क्राइम ब्रांच ने आधा दर्जन आरोपियों को पकड़ा है। इनके पास से चार सेवा पुष्तिका, अभयार्थियों के आधार कार्ड, मोहरे, फर्जी ज्वाइनिंग लेट समे कई कम्पनियों के फर्ती प्रपत्र बरामद हुए है।डीसीपी क्राइम सलमान ताज पाटिल ने बताया कि चकेरी निवासी महिला प्रिया निषाद ने मुकदमा दर्ज कराया था कि स्वरूप नगर निवासी अंकूर ने नौकरी लगवाने के नाम पर चार लाख ठग लिये है।

कोविड के बाद रेलवे का नियुक्ति पत्र लेकर जब वह पहुंची तो फर्जीवाड़े की जानकारी हुई। मुकदमा दर्ज कर क्राइम ब्रांच ने जांच की तो पता चला यह बड़ा गैंग है जो सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी करता आ रहा है। इनका जाल कई प्रदेशों तक फैला हुआ है। क्राइम ब्रांच ने अशोक कुमार, महताब आलम, धमेन्द्र कुमार, अंकुर वर्मा, अक्षय सिंह और प्रदीप सिंह को पकड़ा। प्रदीप आर्डिनेंस फैक्ट्री में काम करता है और टारगेट को अर्मापुर मैदान में ट्रेनिंग दिलवाने का काम करता था।

डीसीपी ने बताया कि नौकरी लगवाने के नाम पर ठगी करने वाले बेहद शातिर है। नौकरी किस कैटेगरी की है उसी हिसाब से रेट तय होता था। शिकार के फंसते ही जिस महकमे में नौकरी लगनी होती थी वहां ले जाते थे जहां उनके लोग मौजूद रहते थे। अभियुक्तों ने बताया कि जानबुझ कर टारगेट को देरी से लेकर पहुंचते थे इस बीच उनका आदमी अफसर बनकर कहीं जाने के लिये निकल रहा होता था देर से आने की बात कहकर किसी होटल में आकर मिलने को कहता था, जिससे पीड़ित को शक नहीं होता था। आधा पैसा पहले लेने के बाद फर्जी नियुक्ति पत्र देने से पहले पैसा ले लेते थे उसके बाद गायब हो जाते थे।

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