लखनऊ: कैंट विधानसभा सीट पर फिर बाजी मारना चाहती है कांग्रेस
लखनऊ। राजधानी की कैंट विधानसभा सीट पर बाजी मारने को लेकर अभी से राजनीतिक दलों में शाह-मात का खेल शुरू हो गया है। भाजपा जहां अपनी सीट बचाने के लिए जुगत लगा रही है, वहीं कांग्रेस अपने पुराने गढ़ पर फिर कब्जा करना चाह रही है। इनके बीच सपा सीट हथियाने के लिए संघर्ष में …
लखनऊ। राजधानी की कैंट विधानसभा सीट पर बाजी मारने को लेकर अभी से राजनीतिक दलों में शाह-मात का खेल शुरू हो गया है। भाजपा जहां अपनी सीट बचाने के लिए जुगत लगा रही है, वहीं कांग्रेस अपने पुराने गढ़ पर फिर कब्जा करना चाह रही है। इनके बीच सपा सीट हथियाने के लिए संघर्ष में जुटी है।
फिलहाल इस सीट पर भाजपा का कब्जा है। वर्ष 2019 में विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा के सुरेश चन्द्र तिवारी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने सपा के मेजर आशीष चतुर्वेदी को 35,428 वोटों के अंतर से हराया था। इस चुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर थी।
कैंट सीट पर पहले था कांग्रेस का कब्जा
इससे पहले इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा था। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी इस सीट से चुनीं गईं थीं, पर उन्होंने बाद में भाजपा का दामन थाम लिया था। वर्ष 2017 के चुनाव में वह भाजपा के टिकट से दोबारा विधायक बनीं। उन्होंने सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव को हराया था। लेकिन वर्ष 2019 में उनके प्रयागराज से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह सीट खाली हो गई थी।
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पुराने समय पर नजर डालें तो वर्ष 1974 से वर्ष 1989 तक इस पर कांग्रेस का ही कब्जा था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के टिकट पर वर्ष 1974 में इस सीट से विधायक थे। हालांकि, वर्ष 1977 में जनता पार्टी के कृष्ण कांत शर्मा ने चुनाव जीता, पर वर्ष 1980 से लेकर वर्ष 1989 तक यह सीट कांग्रेस के कब्जे में रही।
इस दौरान प्रेमवती तिवारी विधायक रहीं। राम जन्म भूमि आंदोलन के दौरान वर्ष 1991 में इस सीट पर भाजपा ने कब्जा किया। सतीश भाटिया 1993 तक विधायक रहे। वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2007 तक भाजपा ने कब्जा बनाये रखा। भाजपा के सुरेश चन्द्र तिवारी चुनाव जीतते रहे।
