उत्तराखंड: ऐसा शक्तिपीठ जहां खेला जाता है पाषाण युद्ध, धरती होती है रक्त से लाल

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हल्द्वानी, अमृत विचार। देवभूमि उत्तराखंड को भगवान का अपार आशीर्वाद प्राप्त है। यहां मौजूद देवों के मंदिर और शक्तिपीठ बरबस ही देश-दुनिया के लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत और चमत्कारिक धाम मां बाराही का भी है। बाराही मंदिर उत्तराखंड के लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर दूर स्थित है। यह शक्तिपीठ …

हल्द्वानी, अमृत विचार। देवभूमि उत्तराखंड को भगवान का अपार आशीर्वाद प्राप्त है। यहां मौजूद देवों के मंदिर और शक्तिपीठ बरबस ही देश-दुनिया के लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत और चमत्कारिक धाम मां बाराही का भी है।

बाराही मंदिर उत्तराखंड के लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर दूर स्थित है। यह शक्तिपीठ समुद्र तल से करीब 1850 मीटर (लगभग पांच हजार फीट) की ऊंचाई पर बसा है। देवीधुरा में बसने वाली मां बाराही का मंदिर 52 पीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, लोकहिताय भगवान विष्णु ने अलग-अलग अवतार लिए। हिंदू पुराणों में भगवान विष्णु के 10 अवतारों का जिक्र है, इसमें एक अवतार भगवान वाराह का भी है।

कहा जाता है कि अधर्मराज और हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल लोक में ले जाते हैं, पृथ्वी पूरी जल मग्न हो चुकी होती है तो पृथ्वी की पुकार को सुनकर भगवान विष्णु वाराह का अवतार लेते हैं और पृथ्वी को ऊपर लाते हैं और पृथ्वी स्वरूप उन्हीं देवी को बाराही देवी कहा गया।

बग्वाल के दौरान हाथों में ढाल लिए योद्धा। (फाइल फोटो )

खुली आंखों से नहीं कर सकता कोई मां बाराही का दीदार

देवीधुरा मंदिर जितना ही खूबसूरत है उतना ही इसके चमत्कारों पर भी चर्चा होती है। कई ऐसे रहस्य हैं जो मंदिर के बारे में अभी भी अनसुलझे हैं। देवीधुरा मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहां देवी की स्थापित मूर्ति को नहीं देख सकते। मां वाराही देवी के मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां वाराही देवी की मूर्ति है। मगर पेटिका में रखी इस देवी मूर्ति के दर्शन अभी तक किसी ने नहीं किए हैं।

मां वाराही देवी के बारे में मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मूर्ति के दर्शन खुली आंखों से नहीं कर सकता है क्योंकि मूर्ति के तेज से उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। इसी कारण देवी की मूर्ति ताम्रपेटिका में रखी जाती है।कहा जाता है कि देवीधुरा मंदिर में जिसने भी माता की मूर्ति को देखने की कोशिश की उसकी आंखों की रोशनी चली गई। इसके साथ ही मंदिर में मौजूद दो विशाल शिलाएं भी आकर्षण का केंद्र हैं। यह शिलाएं ग्रेनाइट की बनी हुई हैं। कहा जाता है कि इन शिलाओं के पास ही पांडवों ने जुआ खेला था। यहां एक शिला पर हाथों के निशान भी हैं जिन्हें स्थानीय लोग भीम के हाथ भी कहते हैं।

देवीधुरा मंदिर की प्राचीन गुफा।

जब मां बाराही के दर पर दी जाती थी नर बलि
देवीधुरा मंदिर में बग्वाल की शुरुआत को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। प्राचीन काल में मां बाराही के मंदिर में माता को खुश करने के लिए नर बलि दी जाती थी। (वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहड़वाल ) इन चारों खामों में से हर साल एक व्यक्ति को चुना जाता था और उसे अपने प्राण माता के समक्ष निछावर करने होते हैं। अब साल दर साल यह प्रथा चलती रही। ऐसा करते करते एक बार चम्याल खाम के सामने उनके वंश के खात्मे का संकट आ गया।

जिस वजह से चम्याल खाम की बुजुर्ग महिला ने अपने पोते की बलि देने से इंकार कर दिया। इससे गांव वालों में डर बैठ गया कि कहीं माता कुपित न हो जाए इसलिए गांव वालों ने फैसला लिया कि वे देवीधुरा मंदिर में बग्वाल का आयोजन कराएंगे और बग्वाल में जैसे ही एक मनुष्य के शरीर जितना खून बह जाएगा तो बग्वाल समाप्त कर दी जाएगी और तभी से नरबलि के विकल्प के रूप बग्वाल का आयोजन होता है।

बग्वाल मेले में बड़ी संख्या में मौजूद योद्धा और दर्शक। (फाइल फोटो)

रक्षाबंधन पर बग्वाल मेले में पत्थरों का युद्ध
देवीधुरा में हर साल रक्षाबंधन के अवसर पर बग्वाल मेले का आयोजन किया जाता है। बग्वाल को पत्थरों से होने वाला युद्ध भी कहा जाता है। हालांकि कुछ सालों से पत्थरों का युद्ध प्रतीकात्मक तौर पर खेला जाता है। पत्थरों के स्थान पर अब फल और फूलों से युद्ध होता है। पत्थरों वाले युद्ध को देखने के लिए देश ही नहीं विदेश से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

बग्वाल वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहड़वाल खामों के बीच होती है। ये चारों खाम दो गुटों में बंट जाते हैं और एक दूसरे पर जमकर पत्थर चलाते है। सामान्यतः बग्वाल 15 मिनट से लेकर 30 मिनट तक के लिए होती है। जिसमें दोनों गुटों के लोगों के साथ देखने आए श्रद्धालु भी घायल होते हैं। बग्वाल के दौरान जिस वक्त रोमांचक युद्ध होता है उस दौरान देवीधुरा मंदिर का पुजारी माता की पूजा अर्चना करता है और जब वो मैदान में शंखनाद कर देता है तो युद्ध समाप्त हो जाता है।

बग्वाल को लेकर एक खास बात यह भी है कि इसमें जिनको भी चोट लगती है उन्हें इलाज की जरुरत नही पड़ती बल्कि इसे माता का आशीर्वाद समझा जाता है। कई लोग चोट पर मंदिर की भस्म लगा लेते हैं। मान्यता कि भस्म के इस्तेमाल से ही चोट ठीक हो जाती है।

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